शुक्रवार, 24 जनवरी 2020

नई खोज की डगर: भारत के कुछ वैज्ञानिक

स्वपन कुमार दत्ता 58 वर्ष
नई खोज की डगर: भारत के कुछ वैज्ञानिक

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, दिल्ली
कमी की पूर्तिः जेनेटिकली परिवर्तित चावल में पर्याप्त प्रोटीन, विटामिन ए और लौह तत्व होगा और यह खून की कमी दूर करने में मददगार होगा. यह उन 100 से अधिक रोगों का जोखिम कम करेगा, जिनका संवाहक चावल है.
लालफीते से संघर्षः कई स्तरों वाली नियामक प्रणाली शोध की राह में रोड़ा है. दत्ता ने तकनीकी और आर्थिक सहयोग में कमी की समस्या का सामना किया. वे कहते हैं, ''कृषि-अार्थिक जमीनी आंकड़े जुटाने के लिए भी थोड़ी और दक्षता की जरूरत है.''

दिमाग पढ़ने की कला
सुब्रह्मण्यम गणेश, 43 वर्ष
नई खोज की डगर: भारत के कुछ वैज्ञानिक
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, कानपुर
जीवन की डोर: लाफोरा रोग के लिए जिम्मेदार दोषपूर्ण जींस के असर की पहचान करना और न्यूरॉन्स के शारीरिक कार्यों को सुधारने के तरीके निकालना, जिसमें उपचार करने वाले उपायों की उम्मीद है.
दिमाग को बदलने वालेः पीएचडी छात्रों के लिए चुनौतीपूर्ण प्रोजक्ट्स लेकर आए. एक पोस्ट-डॉक्टोरल शोधकर्ता से एक शिक्षक बन जाना एक चुनौतीपूर्ण अनुभव था.

अकेले होकर भी जमे रहे
कृष्ण एन. गणेश, 58 वर्ष

नई खोज की डगर: भारत के कुछ वैज्ञानिक
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन ऐंड रिसर्च, पुणे
आनुवांशिक प्रगतिः कृत्रिम, मॉडिफाइड कॉलेजन तैयार किया जिससे खराब कॉलेजन से होने वाली बीमारियां ठीक हो सकती हैं
आगे का रास्ताः खोज को एक व्यावहारिक उत्पाद में बदलने के लिए उद्योग, शोधकर्ताओं और शिक्षकों के बीच बेहतर तालमेल.
नई खोज की डगर: भारत के कुछ वैज्ञानिक

जानने का जुनून
अशोक सेन, 55 वर्ष
हरीशचंद्र रिसर्च इंस्टीट्यूट, इलाहाबाद
स्ट्रिंग थ्योरीः हाल के वर्षों में इस थ्योरी ने क्वांटम ग्रेविटी की समझ बढ़ाई है और ग्रेविटी को क्वांटम मैकेनिक्स के माकूल बनाया है. फिलहाल, स्ट्रिंग थ्योरी पर काम का व्यावहारिक उपयोग नहीं है, पर बकौल सेन इससे भविष्य में ब्रह्मांड की हमारी समझ बदल सकती है.
सबसे कठिन चुनौतीः उनका काम मूलतः चूंकि सैद्धांतिक है, अतः वित्तीय जरूरतें बहुत कम हैं. बकौल सेन, शोध अपने आप में मुश्किल चुनौती है, सो इस थ्योरी के लिए प्रतिभाशाली युवकों की जरूरत है.

सेहत के लिए संघर्ष

विश्वनाथ मोहन, 57 वर्ष
नई खोज की डगर: भारत के कुछ वैज्ञानिक

मद्रास डायबीटिक रिसर्च फाउंडेशन, चेन्नै
सोचा-समझा कदमः शोध को समुदाय की गतिशीलता के साथ जोड़ देना मोहन के फाउंडेशन की आधारशिला है. इसका मुख्य जोर उन परियोजनाओं पर है जिनका उद्देश्य बच्चों और वयस्कों, दोनों में मधुमेह और मोटापे को रोकना है.
पुराने पूर्वाग्रहः मोहन का कहना है कि मधुमेह संबंधी शोध को सरकार और दूसरी एजेंसियों से ज्‍यादा पैसे की दरकार है. इसमें और सहयोग चाहिए तथा ज्‍यादा से ज्‍यादा टेक्नोलॉजिस्ट इससे जुड़ें. उन्हें जिस दूसरी समस्या का सामना करना पड़ता है, वह है लोगों को इस बात का कायल करना कि वे मधुमेह के सर्वेक्षणों में जानकारी दें.

दिमाग पर नजर
उपिंदर एस. भल्ला, 48 वर्ष

नई खोज की डगर: भारत के कुछ वैज्ञानिक
नेशनल सेंटर फॉर बायोलॉजिकल साइंसेज, बंगलुरू
दिमाग पर जोरः भल्ला के शोध में मुख्यतः मस्तिष्क की कार्यशैली पर ध्यान दिया गया है. इससे खासकर बुजुर्गों में तंत्रिका ह्रास (न्यूरो डिजनरेशन) जैसे क्षेत्रों में नई जानकारी की उम्मीद है. वे यह भी पता लगा रहे हैं कि जब यादें बनती हैं तो दिमाग में क्या होता है.
बेशकीमती वक्तः अपने शोध के अलावा भल्ला 10 छात्रों के निरीक्षक हैं और ढेर प्रशासकीय जिम्मेदारियां निभाते हैं.

किसानों के मित्र
उषा बरवाले जेर, 50 वर्ष; बी.आर. चार, 47 वर्ष
नई खोज की डगर: भारत के कुछ वैज्ञानिक

महाराष्ट्र हाइब्रिड सीड्स कंपनी लिमिटेड, जालना
वरदान या अभिशाप? भारत के आनुवंशिक रूप से परिवर्धित (जीएम) पहले खाद्यान्न बीटी बैंगन का श्रेय, जिसे जालना में महाराष्ट्र हाइब्रिड सीड्स कंपनी लि. ने तैयार किया, मुख्यतः इन्हीं दोनों के 2000 से किए गए प्रयासों को दिया जाता है.
लाल फीताः सरकार ने 9 फरवरी, 2010 को ऐलान किया कि उसे बीटी बैंगन की वाणिद्गियक बिक्री की मंजूरी के लिए समय चाहिए.
जींस के गुरु
पार्थ प्रतिम मजूमदार, 59 वर्ष
नई खोज की डगर: भारत के कुछ वैज्ञानिक

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ बायोमेडिकल जीनोमिक्स, कल्याणी
नई आशाः यहां के शोध से मुख कैंसर, हृदयघात के अलावा जिगर और नेत्र रोगों के बारे में ज्‍यादा जानकारी मिल सकती है. कैंसर जीनोम अनुसंधान से किसी को बीमारी होने से पहले इसके बारे में पता चल जाएगा. व्यक्तियों का अलग-अलग इलाज संभव होगा.
पुरानी समस्याः स्वतंत्र शोध के लिए पैसा जुटाना चिंता का विषय है. संस्थान अच्छे क्लिनिकल सहयोगी ढूंढ़ने को प्रयासरत है.
जर्रे-जर्रे में जादू
प्रद्युत घोष, 41 वर्ष

नई खोज की डगर: भारत के कुछ वैज्ञानिक
इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ साइंस,
जादवपुर, कोलकाता
एक बेहतर दुनिया की खातिरः घोष के शोध का उद्देश्य मुख्यतः स्वास्थ्य और पर्यावरण की समस्याओं को सुलझाने के लिए है. इसमें पेयजल में फ्लूराइड, विभिन्न विषाक्त आयनों की जांच, हवा में कार्बन डाइऑक्साइड की बढ़ती मात्रा और प्राकृतिक संसाधनों से विशुद्ध एल्कलाइ (क्षारीय) मेटल सॉल्ट को अलग करने के लिए प्रौद्योगिकी का विकास शामिल है.
वक्त की जरूरतः इस संस्थान को ज्‍यादा समर्पित शोधकर्ताओं, अत्याधुनिक बुनियादी ढांचे और पर्याप्त फंड की बेहद जरूरत है.
sabhaar  https://aajtak.intoday.in/

बुधवार, 22 जनवरी 2020

तकनीक 2020 - जो बदल देगी दुनिया

Symbolbild Cyber Angriff (Imago/Science Photo Library)

तकनीकी कंपनियों के लिए साल 2019 शानदार रहा. लेकिन नए दशक में कंपनियां ग्राहकों के लिए और बहुत कुछ पेश करने वाली हैं. कुछ तकनीकें अगले कुछ महीने में बाजार में होंगी जबकि कुछ पर कंपनियां अभी भी काम कर रही हैं.
ग्रीन तकनीक
2019 में कंपनियों ने पर्यावरण संरक्षण को लेकर कई कदम उठाए. नए दशक में भी कंपनियां पर्यावरण के अनुकूल ही टेक्नॉलोजी पर काम करेंगी जिससे कार्बन उत्सर्जन कम हो और पर्यावरण को कम से कम नुकसान हो. कई कंपनियां अक्षय ऊर्जा पर जोर-शोर से काम कर रही हैं.
डाटा सुरक्षा
2020 में लोग अपने डाटा को लेकर और ज्यादा सजग होंगे और सरकार की सख्तियों के बाद कंपनियों पर भी लोगों के डाटा संरक्षण का दबाव होगा. उम्मीद है कि 2020 में कंपनियां डाटा को सुरक्षित करने के लिए नए उपायों को भी अपनाएंगी.
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस
दुनियाभर में क्लाउड कंप्यूटिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक की ही चर्चा हो रही है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को और सटीक और बेहतर बनाने के लिए कंपनियां करोड़ों डॉलर खर्च कर रही हैं. अमेजन के अलेक्सा सक्षम गैजेट्स भी लोगों को खूब भा रहे हैं. उम्मीद है कि 2020 में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ज्यादा सटीक और तेज हो जाएगा.
5जी नेटवर्क कवरेज का विस्तार
फिलहाल मोबाइल पर जो 4जी डाटा स्पीड है उसके मुकाबले 5जी कहीं अधिक तेज होगा. 5जी इंटरनेट स्पीड पर 4के रिजॉल्यूशन वाली पूरी की पूरी फिल्म मिनटों में डाउनलोड हो जाएगी. 5जी इंटरनेट आज के तकनीक के मुकाबले 10 से लेकर 100 गुना तेज चल सकता है. हालांकि 5जी तकनीक को इस्तेमाल करने के लिए आपको नया हैंडसेट खरीदना पड़ेगा

ड्राइवरलेस कारें

तेज रफ्तार जिंदगी में हर किसी को जल्दी है. ऐसे में ड्राइवर-रहित कारों की बिक्री भी बढ़ने की उम्मीद है. कई कंपनियां बिना ड्राइवर वाली कार पर तेजी से काम कर रही हैं. हालांकि इन कारों को चलाने के लिए खास अनुमति चाहिए होगी. यही नहीं सुरक्षा के लिहाज से भी कुछ नए कानूनों की भी आवश्यकता पड़ेगी.
साभार https://www.dw.com/

ड्रा


वैज्ञानिकों ने कैमरे पर मानव की आंखों से चमकती हुई रहस्यमयी घटना को पकड़ लिया

Eye


"हमारे वास्तविक समय के आंकड़ों ने कड़ाई से दिखाया कि उत्पादित प्रकाश की मात्रा एक दृश्य सनसनी को पर्याप्त करने के लिए पर्याप्त है - एक विषय जिसे साहित्य में बहस की गई है," तेंडलर कहते हैं। "वर्णक्रमीय रचना का विश्लेषण करके, हम यह भी बताते हैं कि इस उत्सर्जन को चेरनकोव प्रकाश के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है - फिर से, साहित्य में एक और प्रतियोगिता बिंदु।"
शोध को इंटरनेशनल जर्नल ऑफ रेडिएशन ऑन्कोलॉजी में प्रकाशित किया गया है, जिसका उद्देश्य भविष्य की रेडियोथेरेपी तकनीकों को बेहतर बनाना है: उदाहरण के लिए, चेरेंकोव उत्सर्जन का पता लगाना एक संकेत के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है कि उपचार ने अपने इच्छित लक्ष्य को मारा है या नहीं। वैज्ञानिकों ने इस बात के बीच एक संबंध देखा कि क्या मरीज हल्की चमक देखते हैं और क्या वे बाद में किसी दृष्टि हानि का अनुभव करते हैं।


"हालांकि प्रकाशित तंत्रिका उत्तेजना के बारे में सिद्धांत, लेंस का परिमार्जन, और अल्ट्राविक बायोलुमिनसेंट फोटॉनों से इंकार नहीं किया जा सकता है, लेकिन यह स्पष्ट लगता है कि आंख में चेरेंकोव प्रकाश उत्पादन मात्रात्मक और महत्वपूर्ण है," शोधकर्ताओं ने अपने प्रकाशित पेपर में निष्कर्ष निकाला है। साभार https://sputniknews.com/science


रविवार, 19 जनवरी 2020

वैज्ञानिकों ने ट्यूमर के अंदर ही खोजी कैंसर से लड़ने की "फैक्ट्रियां"

ताजा शोध से पता चला है कि कुछ ट्यूमर या कैंसर के अंदर ही प्रतिरक्षा कोशिकाओं की "फैक्ट्रियां" होती हैं. जो शरीर को कैंसर के खिलाफ लड़ने में मदद करती हैं.
Blutzellen (Imago Images/Science Photo Library)
हाल के वर्षों में डॉक्टरों ने कैंसर के खिलाफ लड़ने के लिए इम्यूनोथेरेपी के जरिए नया इलाज खोजा है. इसमें शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत कर उन्हें ट्यूमर से लड़ने लायक बनाया जाता है.
यह तकनीक तृतीयक लिम्फॉइड संरचनाएं (टीएलएस) इस इलाज में कारगर साबित हुई हैं. हाल के वर्षों में, डॉक्टरों ने कैंसर, इम्यूनोथेरेपी के नए उपचार की ओर रुख किया है, जो ट्यूमर से लड़ने के लिए शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली का लाभ उठाकर काम करता है. साइंस जर्नल "नेचर" में इस उपचार से संबंधित तीन शोध प्रकाशित हुए हैं. जो दुनिया के अलग देशों के वैज्ञानिकों की ओर से आए हैं.
शोध में बताया गया है कि श्वेत रक्त कोशिकाएं या टी-सेल्स ट्यूमर को मारने का काम कैसे करती हैं. कैंसर कोशिकाओं को पहचानने और उन पर हमला करने के लिए यह "प्रशिक्षित" होती हैं. हालांकि यह उपचार केवल 20 प्रतिशत रोगियों पर ही बेहतर काम कर रहा है. शोधकर्ता यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि क्यों कुछ ही मरीज इस इलाज में बेहतर परिणाम दे रहे हैं.
वैज्ञानिकों ने बताया कि ट्यूमर या कैंसर पर बनी कुछ कोशिकीय संरचनाएं शरीर को कैंसर से लड़ने में मदद करने के लिए "कारखानों या स्कूलों" जैसे काम करती हैं. पेरिस डेकार्टी यूनिवर्सिटी मेडिकल स्कूल के कॉर्डेलिए रिसर्च सेंटर में इम्यूनोलॉजी के प्रोफेसर वुल्फ फ्रीडमैन ने समाचार एजेंसी एएफपी से बातचीत में कहा, "इन टी-कोशिकाओं को तृतीयक लिम्फॉइड संरचनाओं के 'स्कूलों' में शिक्षित करने की आवश्यकता है. जहां वे प्रभावी रूप से कैंसर कोशिकाओं को पहचाकर उन पर हमला करना सीख सकते हैं." 
रिसर्च का निष्कर्ष है कि केवल टी-सेल ही कैंसर से लड़ने में सक्षम नहीं हैं बल्कि ऐसे कुछ और एजेंट भी शरीर में हैं. शोधकर्ताओं ने पाया कि तृतीयक लिम्फॉइड संरचनाएं या टीएलएस, बी-सेल से भरी हुई थीं, जो भी एंटीबॉडी का उत्पादन करने वाली एक तरह की प्रतिरक्षा कोशिकाएं हैं. प्रोफेसर फ्रीडमैन ने बताया, "हम 15 साल से टी-सेल से ही कैंसर को खत्म करने के आदी बन चुके हैं. हमने यह देखने के लिए सारकोमा जैसे कैंसर का विश्लेषण किया कि उनके पास कौन से समूह हैं. जो कैंसर से लड़ सकते हैं. इसके परिणामस्वरूप हमारे पास बी-कोशिकाएं आईं."
अमेरिका की टेक्सास यूनिवर्सिटी के एंडरसन कैंसर सेंटर में सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग की डॉक्टर बेथ हेल्मिंक कहती हैं कि इस खोज ने इम्यूनोथेरेपी में बी-कोशिकाओं से जुड़ी धारणाओं को बदल दिया है. बेथ के मुताबिक, "इन अध्ययनों के माध्यम से हमने पाया कि बी-कोशिकाएं ट्यूमर-विरोधी प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया के लिए एक सार्थक तरीके से योगदान दे रही हैं." 
इस खोज में कई आश्चर्यजनक बातें सामने आई हैं. पहले कैंसर रोगियों में बी-कोशिकाओं की बहुतायत को ज्यादातर खराब रोग के रूप में देखा जाता रहा है. इसके उलट अध्ययन में पाया गया कि उनके ट्यूमर में टीएलएस के अंदर बी- कोशिकाओं के उच्च स्तर वाले रोगियों में इम्यूनोथेरेपी के लिए अच्छी प्रतिक्रिया की संभावना होती हैं. 
बार्ट्स एंड लंदन स्कूल ऑफ मेडिसिन एंड डेंटिस्ट्री में लेक्चरर लुईसा जेम्स कहती हैं, "अध्ययन की यह श्रृंखला रोमांचक इसलिए भी है क्योंकि यह विभिन्न प्रकार के कैंसर के उपचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकने में सक्षम है. हालांकि जेम्स इस अध्ययन में शामिल नहीं थीं, उन्होंने इस शोध को पढ़ने के बाद कहा, "कम समय में ही इस शोध के परिणामस्वरूप रोगियों को इम्यूनोथेरेपी से लाभ होने की संभावना के लिए नया टूल मिल जाएगा. जिससे भविष्य में बेहतर उपचार का मार्ग भी प्रशस्त हो सकता है."
कैंसर के सभी प्रश्नों का जवाब नहीं है यह शोध 
हालांकि अभी भी कई प्रश्न हैं जिनके उत्तर नहीं मिल पाए हैं. जैसे कि ऐसी संरचनाएं कुछ ही तरह के ट्यूमर में क्यों बनती हैं और बाकी में नहीं. यह स्पष्ट हो गया है कि इन्ही संरचनाओं के अंदर पाई जाने वाली बी-कोशिकाएं इम्यूनोथेरेपी की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, लेकिन ऐसा कैसे होता है इसका उत्तर अब तक वैज्ञानिकों के पास नहीं है. 
यह हो सकता है कि बी-कोशिकाएं कैंसर कोशिकाओं से लड़ने के लिए आगे आती हों और एंटीबॉडी का निर्माण करती हों. सभी टीएलएस समान नहीं होते. शोधकर्ताओं ने कोशिकाओं की तीन श्रेणियां पाईं लेकिन केवल एक कोशिका कैंसर को मात देने में "परिपक्व" पाई गई. 
विशेषज्ञों का कहना है कि इस रिसर्च ने कई आशाजनक रास्ते खोले हैं. यह शोध डॉक्टरों को उन मरीजों का इलाज करने में मदद कर सकता है जो इम्यूनोथेरेपी के लिए अच्छी प्रतिक्रियाएं देते हैं. स्वीडन के लुंथ विश्वविद्यालय में ऑन्कोलॉजी और पैथोलॉजी के प्रोफेसर गोरान जॉनसन ने इनमें से एक अध्ययन पर काम किया है. जॉनसन बताते हैं, "अगर कोई ऐसा उपचार विकसित किया जा सके जिससे टीएलएस के निर्माण को बढ़ाया जा सके, तो हम इसे आजकल की इम्यूनोथेरेपी रेजिमेंट के साथ जोड़ कर इलाज कर सकते हैं." उनका मानना है कि इससे ज्यादा से ज्यादा रोगियों में इम्यूनोथेरेपी का असर दिखेगा."
एसबी/आरपी (एएफपी) sabhar DW.de