मंगलवार, 27 जनवरी 2015

मिला हमेशा जवान रहने का नुस्खा

एक प्रोफेसर का दावा है कि उसने दक्षिण जापान के लोगों की लंबी उम्र का राज ढूंढ निकाला है. यह राज एक खास पौधे के अर्क में छुपा है, जिसे स्थानीय लोग "गेटो" के नाम से जानते हैं.
ओकिनावा की रियूक्यूस यूनिवर्सिटी में कृषि विज्ञान के प्रोफेसर शिंकिचि तवाडा ने दक्षिण जापान के लोगों की लंबी उम्र का राज ढूंढ निकाला है. तवाडा को विश्वास है कि गहरे पीले-भूरे से रंग का दिखने वाला एक खास पौधे "गेटो" का अर्क इंसान की उम्र 20 फीसदी तक बढ़ा सकता है. तवाडा कहते हैं, "ओकिनावा में कई दशक से लंबी उम्र तक जीने का दर दुनिया में सबसे ज्यादा रहा है और मुझे लगता है कि इसका कारण जरूर यहां के परंपरागत खान पान में ही छुपा है."
काइको उहारा 64 साल की हैं लेकिन अपनी उम्र से कहीं कम की दिखती हैं. इसका राज वह गेटो को बताती हैं. काइको अपनी दुकान में ऐसे सौंदर्य उत्पाद भी बेचती हैं जिनमें गेटो ही मुख्य घटक होता है, "मैं गेटो का काढ़ा पीती हूं, जो मुझे तरो ताजा कर देता है, और मैं इस पौधे के अर्क को पानी में घोल कर लगाती हूं जिससे झुर्रियां भी कम होती हैं."
दक्षिण जापान में जीते हैं लोग काफी लंबी उम्र
पौधे में छुपा है रहस्य
तवाडा पिछले 20 साल से अदरक के परिवार के एक खास पौधे का अध्ययन कर रहे हैं जिसे स्थानीय लोग "गेटो" के नाम से जानते हैं. इसे विज्ञान की भाषा में एल्पिनिया जेरूंबेट, पिंक पोर्सिलेन लिली या शेल जिंजर के नाम से भी जाना जाता है. तवाडा को लगता है कि उनके इतने लंबे शोध का फल अब मिल गया है. कुछ समय पहले ही कीड़ों पर किये एक प्रयोग में उन्हें उत्साहजनक नतीजे मिले जब उन्होंने देखा कि जिन कीड़ों को रोज गेटो की खुराक दी जा रही थी, उनकी उम्र अन्य कीड़ों के मुकाबले 22.6 प्रतिशत ज्यादा रही.
बड़ी हरी पत्तियों, लाल फलों और सफेद फूलों वाला यह पौधा सदियों से ओकिनावा के खानपान का खास हिस्सा रहा है और अब भी जंगली पौधे की तरह उगता है. तवाडा कहते हैं कि पहले लोगों को भले ही यह नहीं पता था कि इसमें रेसवेराट्रॉल नाम का एंटीऑक्सिडेंट प्रचुर मात्रा में पाया जाता है. लेकिन वे यह जरूर जानते थे कि यह पौधा उनकी सेहत के लिए फायदेमंद है. तकाडा बताते हैं, "परंपरागत रूप से ओकिनावा के लोग जानते थे कि जाड़ों में बनाया जाने वाला एक खास व्यंजन, मुची, जिसे चावल के पेस्ट को गेटो की पत्ती में लपेट कर बनाया जाता था, सर्दी से बचाने के साथ साथ ताकत भी देती थी."
दुनिया का सबसे बुजुर्ग आदमी जापान का है
'फास्ट फूड की बढ़ती ललक'
लेकिन ओकिनावा में भी चीजें बहुत बदल गई हैं. परंपरागत खानपान की चीजें जिसमें स्थानीय सब्जियों, मछलियों और समुद्री शैवालों की अधिकता होती थी, उनकी जगह अब स्टेकहाउस और बर्गर बेचने वाली दुकानें लेती जा रही हैं. ओकिनावा द्वीप समूह की राजधानी नाहा की सड़कें ऐसी दुकानों से भरती जा रही हैं.
ओकिनावा की महिलाएं आज भी बहुत लंबा जीवन जी रही हैं. सत्तासी साल की औसत आयु वाली इन महिलाओं की जीने की दर अब भी जापान में सबसे लंबी उम्र की सूची में काफी ऊपर है. लेकिन पुरूष 79.4 वर्ष की औसत आयु के साथ इस सूची में नीचे आ गए हैं और राष्ट्रीय औसत से भी कम है. और तो और इस द्वीप समूह में पुरूषों में मोटापे की दर जापान में सबसे ऊंची है. तवाडा कहते हैं, "आजकल लोग फास्टफूड बहुत खाते हैं, लंबे जीवन की प्रत्याशा कम हो रही है. समय आ गया है कि अपने क्षेत्र के खानपान की परंपराओं से दुबारा जुड़ा जाए."
गेटो का बढ़ता कोरोबार
गेटो के स्वास्थ्य से जुड़े फायदे धीरे धारे लोगों को पता चल रहे हैं. तवाडा के रिसर्च के इर्द गिर्द एक पूरा कुटीर उद्योग विकसित हो रहा है. शहर के थोड़ा बाहर इसामु कीना ने पूरे खेत में गेटो उगाया है. उनकी कंपनी रिच ग्रीन इस क्षेत्र में गेटो की सबसे बड़ी उत्पादक है. इसामु कहते हैं, "हमें ओकिनावा पर सीमित रहने की कोई जरूरत नहीं है. हम इसे दुनिया के कोने कोने तक पहुंचाना चाहते हैं."
वहीं अपनी प्रयोगशाला में काम करते तवाडा को लगता है कि लोगों ने अब इस पौधे के महत्व को समझना शुरू कर दिया है. उन्हें लगता है कि आने वाले समय में यह ओकिनावा और पूरी दुनिया को भी काफी बदल देगा, "आज गेटो का इस्तेमाल सिर्फ सुंदरता बढ़ाने के लिए किया जा रहा है. लेकिन यह इसका सिर्फ एक उपयोग है और मुझे लगता है कि जल्द ही गेटो का इस्तेमाल दवाइयों और अन्य क्षेत्रों में होने लगेगा. मैं उम्मीद करता हूं कि एक दिन गेटो पूरे द्वीप की अर्थव्यवस्था को ऊपर उठाएगा."
आरआर/आईबी (एएफपी)

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जब सबको पता होगा हमारे बारे में

कल्पना कीजिए एक दुनिया की जहां निजता जैसी कोई चीज नहीं होगी. मच्छर के साइज का एक रोबोट आए और बिना किसी अदालती आदेश के आपका डीएनए चुरा ले जाए. ऐसा कुछ सच होने वाला है. शुरुआत हो चुकी है.
आप खरीदारी के लिए जाएं और दुकानों को पहले से ही पता हो कि आपकी खरीदने की आदतें कैसी हैं. भविष्य की दुनिया की ऐसी कई तस्वीरें हार्वर्ड के कुछ प्रोफेसरों ने दावोस के विश्व आर्थिक फोरम में खींची. यहां दुनिया भर से आए राजनीतिक और आर्थिक जगत के चोटी के प्रतिनिधियों को बताया गया कि अब व्यक्तिगत निजता जैसी कोई धारणा नहीं रही. हार्वर्ड के कंप्यूटर साइंस की प्रोफेसर मार्गो सेल्टजर ने कहा, "आपका आज में स्वागत है. हम उस दुनिया में पहुंच चुके हैं. जिस निजता को हम अब तक जानते आए हैं, वह अब संभव नहीं है."
जेनेटिक्स के क्षेत्र में शोध करने वाले एक अन्य हार्वर्ड प्रोफेसर सोफिया रूस्थ ने कहा कि इंसान की व्यक्तिगत जेनेटिक सूचना का सार्वजनिक क्षेत्र में जाना अब अपरिहार्य हो गया है. रूस्थ ने बताया कि खुफिया एजेंटों को विदेशी राजनेताओं की जेनेटिक जानकारी चुराने को कहा जा रहा है ताकि उनकी बीमारियों और जिंदा रहने के समय के बारे में पता चल सके. ये जानकारियां राजनीति को निर्धारित कर सकती हैं. ऐसे सोचिए कि अगर तब मोहम्मद अली जिन्ना की बीमारी के बारे में पता होता तो शायद भारत का विभाजन नहीं होता.
जेनेटिक जानकारियां लोगों के लिए समस्या भी पैदा कर सकती हैं. सेल्टजर एक ऐसे विश्व की कल्पना करती हैं जहां सरकारों या इंश्योरेंस कंपनियों के मच्छर के आकार वाले रोबोट लोगों का डीएनए जुटाएगें या चुराएंगे. इस तरह निजता का हनन आम बात हो जाएगा. सेल्टजर कहती हैं, "ऐसा नहीं है कि यह होगा, ऐसा हो रहा है, हम आज जासूसी करने वाले राज्य में रह रहे हैं."
राजनीतिशास्त्री जोसेफ नाय ने कंप्यूटर में जानकारी को इंक्रिप्ट करने और सरकार को हर सूचना को देखने की अनुमति देने पर चल रही बहस के बारे में कहा, "सरकारें संचार में पिछला दरवाजा खुला रखने की बात कर रही हैं ताकि आतंकवादी जासूसी होने के डर के बिना संवाद न कर सकें." नाय ने कहा कि समस्या यह है कि अगर सरकारें ऐसा कर सकती हैं तो अपराधी भी कर सकते हैं. उन्होंने सवाल पूछा, "आप किससे ज्यादा चिंतित हैं, बिग ब्रदर से या बदमाश चचेरे भाई से?"
भविष्य की इस निराशावादी तस्वीर के बावजूद संतोष की बात यह है कि तकनीक इंसान को जितना खतरा पहुंचा रही है, उससे ज्यादा फायदा भी दे रही है. भविष्य के मुद्दों पर शोध करने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक का सकारात्मक पहलू निजताओं के हनन से कहीं ज्यादा है.
एमजे/आरआर (वार्ता) sabhar :http://www.dw.de/

सोमवार, 5 जनवरी 2015

मंगल पर 'एलियन की जांघ की हड्डी' धरती से बाहर जीवन का सबूत?

लंदन नासा के क्यूरियॉसिटी रोवर को मंगल की सतह पर अकेले चक्कर काटते हुए 2 साल से ज्यादा का वक्त बीत चुका है। हाल ही में इस रोवर द्वारा खींची गई एक तस्वीर से एलियन्स के वजूद में यकीन रखने वाले बेहद उत्साहित हैं। उन्हें मंगल की सतह पर कुछ ऐसा दिखा है, जिसे वे इस बात का सबूत बता रहे हैं कि हमारे अलावा इस ब्रह्मांड में कोई और भी है। मंगल की सतह पर कुछ ऐसा दिखा है, जिसे 'एलियन की जांघ की हड्डी' बताया जा रहा है। 

एलियन की तलाश और उनकी मौजूदगी को साबित करने की कोशिश में नई-नई थिअरीज पेश करने वाले लोग नासा के क्यूरियॉसिटी रोवर की खींची इस तस्वीर के आधार पर दावा कर रहे हैं कि मंगल ग्रह पर भी किसी वक्त जीवन रहा होगा। उनका दावा है कि रोवर के मैस्टकैम से 14 अगस्त को ली गई इस तस्वीर से साफ होता है कि किसी वक्त मंगल की सतह पर बड़े जानवर और शायद डायनॉसॉर तक घूमा करते थे। हालांकि, वैज्ञानिकों ने इस बात की पुष्टि नहीं की है कि हडड 

'नॉर्दर्न वॉइसेज ऑनलाइन' नाम के पोर्टल पर एक अज्ञात शख्स ने लिखा है, 'इस तस्वीर में दिख रही हड्डी से साफ होता है कि मंगल पर किसी वक्त कुछ तो रहता था।' पॉप्युलर साइट 'यूएफओ ब्लॉगर' ने तो इस तस्वीर की तुलना धरती पर पाए गए सरीसृप प्रजाति के फॉसिल्स की तस्वीरों से भी की है। वे दिखाना चाहते हैं कि तस्वीर में दिख रही चीज़ किसी जानवर की हड्डियों के अवशेष हैं। 

बहुत सारे लोगों को लगता है कि मंगल ग्रह पर जीवन है। पिछले साल कुछ वैज्ञानिकों ने यह थिअरी सामने रखी थी कि आज से करीब 6 करोड़ 60 लाख साल पहले धरती पर डायनॉसॉर का खात्मा करने वाला जो उल्कापिंड गिरा था, उसके टुकड़े जीवन बनाने के लिए उपयोगी तथ्वों को मंगल तक ले गए होंगे। मगर साइंटिस्ट्स का यह भी मानना है कि मंगल करोड़ों सालों से वीरान है और यहां पानी भी नहीं। ऐसे में यहां जीवन की संभावना का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। 


वैज्ञानिकों का मानना है कि यह हड्डी नहीं, बल्कि पत्थर का कोई ऐसा टुकड़ा है जो हड्डी की तरह दिख रहा है। बावजूद इसके बहुत से लोग इस तस्वीर को मंगल पर जीवन होने का सबूत मानते हुए तरह-तरह की थिअरीज़ गढ़ने में जुटे हुए हैं। गौरतलब है कि कुछ दिन पहले ही कुछ लोगों ने चांद की सतह की एक तस्वीर पर परछाई देखी थी और दावा किया था कि वह एक एलियन था। मगर बाद में नासा ने इस दावे को खारिज करते हुए इसे लोगों की कल्पना की देन करार दिया था।
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ऐसे आप खुद बिजली पैदा कर सकेंगे

वैज्ञानिकों ने विश्व के सबसे पतले इलेक्ट्रिक जेनरेटर का किया एक्सपेरिमेंट
पीटीआई, न्यू यॉर्क
अनुसंधानकर्ताओं का दावा है कि उन्होंने सबसे दुबला जेनरेटर विकसित किया है, जो देखने में ट्रांसपैरेंट, बेहद हल्का, मोड़ा जा सकनेवाला और खींचकर लंबा किए जा सकने की क्षमता से लैस होगा। कोलंबिया इंजीनियरिंग ऐंड जॉर्जिया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी के रिसर्चर्स ने इसे पीजोइलेक्ट्रिसिटी नाम दिया है और पहली बार इसका एक्सपेरिमेंटल ऑब्जर्वेशन किया है। ये कमाल है मॉलेब्डेनम डाइसल्फाइड (MoS2) का। वैज्ञानिकों ने इसे एटॉमिक रूप से बेहद पतले मैटीरियल में डाला और इसका पीजोट्रॉनिक इफेक्ट देखा। वैज्ञानिकों ने पाया कि ये एक विशेष तरह के इलेक्ट्रिक जनरेटर की तरह काम कर रहा है। रिसर्चर्स ने पावर प्रोडक्शन कर इसका डिमॉन्सट्रेशन भी किया।
क्या है पीजोइलेक्ट्रिक इफेक्ट
एक खास बात और इस जेनरेटर में कि पीजोइलेक्ट्रिक इफेक्ट को इससे पहले केवल थिऑरिटिकली ही समझा गया था। पीजोइलेक्ट्रिसिटी एक ऐसा इफेक्ट है, जिसमें किसी मैटीरियल को खींचने या दबाने से बिजली पैदा होती है। इस प्रयोग से मॉलेब्डेनम डाइसल्फाइड की खासियत का भी पता चला, जिसे इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस में भी यूज किया जा सकता है। कोलंबिया इंजीनियरिंग के प्रफेसर जेम्स होन ने बताया कि चूंकि ये मैटीरियल काफी हलका है, ऐसे में इसे वियरेबल डिवाइस भी बनाया जा सकता है, जो आपके शरीर की ऊर्जा को बिजली में बदल देगा, जिससे आप अपना मोबाइल चार्ज करने जैसे तमाम काम कर सकेंगे।
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शनिवार, 3 जनवरी 2015

2014 में साइंस' के टॉप 10 आविष्कार

साइंस पत्रिका ने साल 2014 में सामने आईं ढेरों नई खोजों और आविष्कारों में से चुनी हैं ये 10 खास चीजें. इसमें चूहों में मिले चिरयौवन के राज से लेकर डायनासोर से जुड़े खुलासे शामिल हैं.

Orbiter Philae on the comet 67P/Churyumov-Gerasimenko
चांद पर पहला कदम रखने जैसा बड़ा कदम
साल 2014 की सबसे बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि रही यूरोपीय स्पेस एजेंसी के रोजेटा मिशन के नाम. 12 नवंबर को रोजेटा मिशन में ऑर्बिटर फिले को कॉमेट 67पी/चूरियूमोव-गेरासिमेंको पर सफलतापूर्वक लैंड कराया गया. फिले पर कुल 20 वैज्ञानिक उपकरण लगे हैं जो वहां धरती पर जीवन की उत्पत्ति और ब्रह्मांड की रचना से जुड़े सवालों के जवाब ढूंढ रहे हैं.

Indonesien cave painting in Sulawesi

इंसानों की बनाई सबसे पहली पेंटिंग
अक्टूबर 2014 में साइंस में छपी रिपोर्ट में बताया गया कि इंडोनेशिया के सुलावेसी द्वीप में चूना पत्थर की गुफा में करीब 40,000 साल पुरानी पेंटिंग मिली है. इसे मानव इतिहास की सबसे पुरानी पेंटिंग माना जा रहा है. इससे पहले तक सबसे पुरानी पेंटिंग यूरोप में मिली मानी जाती थी.
DNA

पहला सेमी-सिंथेटिक जीव
कैलिफोर्निया के स्क्रिप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने एक बैक्टीरिया ई. कोलाई के डीएनए को बढ़ाने में सफलता पाई. उन्होंने एक सूक्ष्मजीव के डीएनए में दो सिंथेटिक बेस पेयर जोड़ने में कामयाबी पाई. यह बेस पेयर जेनेटिक्स की दुनिया के अक्षर जैसे हैं जिनके क्रम से ही किसी जीव के लक्षण बनते हैं. इस प्रयोग के माध्यम से उन्होंने एक जीते जागते जीव के जीनोटाइप में परिवर्तन ला दिया.

Reconstruction of Archaeopteryx
डायनासोर से चिड़िया
कई रिसर्चरों ने चिड़ियों और डायनासोरों के बीच संबंधों पर काम किया. ऐसी एक खोज में पाया गया कि जैसे जैसे डायनासोरों में हल्की हड्डियां विकसित होने लगीं, वे खाना और आश्रय ढूंढने में बेहतर होने लगे. विकास के क्रम में आगे चलकर पंख विकसित हुए और वे उड़ कर एक जगह से दूसरी जगह पहुंचने लगे और इस तरह पक्षी बने.
An insulin injection.

डायबिटीज का इलाज
रिसर्चरों ने ऐसी थेरेपी विकसित की जिसमें इंसुलिन पैदा कर सकने वाली बीटा कोशिकाओं का पुनर्निर्माण किया जा सके. बीटा कोशिकाएं ही इंसान के पैंक्रियाज य अग्नाशय में पर्याप्त इंसुलिन पैदा करवाती हैं जिससे ब्लड शुगर का स्तर सामान्य बना रहे. टाइप 1 डायबिटीज के मरीजों में बीटा कोशिकाएं नहीं पाई जातीं और इसीलिए उन्हें इंसुलिन के इंजेक्शन लेने पड़ते हैं. इस खोज से डायबिटीज का इलाज मिलने की उम्मीद जगी है.
lab mouse

चिरयौवन का स्रोत
रिसर्चरों ने एक युवा चूहों के रक्त से जीडीएफ11 नाम का एक प्रोटीन अलग किया और उसे बूढ़े चूहों में इंजेक्ट कर दिया. नतीजे चौंकाने वाले थे. बूढ़े चूहों में मांसपेशियों और मस्तिष्क का फिर से विकास होने लगा. इस तरह रक्त और प्लाज्मा की मदद से वैज्ञानिक चूहों में याददाश्त को सुधारने में सफल रहे. अब इस तरह के परीक्षण किए जा रहे हैं जिससे रक्त प्लाज्मा ट्रीटमेंट कर अल्जाइमर्स जैसी बीमारियां रोकी जा सके.
Synapses

मस्तिष्क की प्रोग्रामिंग
2014 में ऑप्टोजेनेटिक्स के क्षेत्र में काफी प्रगति हुई. रिसर्चरों ने अनुवांशिक रूप से बदले गए खास चूहों के दिमाग में लेजर लाइटों की बीम फेंक कर उनकी बुरी यादों को अच्छी यादों में बदल दिया. अब स्टैनफोर्ड के वैज्ञानिक इस तरीके का इस्तेमाल कर कई तरह की दिमागी परेशानियों को दूर करने के उपाय खोज रहे हैं.
16 TrueNorth Chips

कंप्यूटर चिप में इंसानी दिमाग के गुण
आईबीएम के इंजीनियरों ने न्यूरोमॉर्फिक चिप्स बनाने में कामयाबी पाई, जो इंसानी दिमाग की नकल कर सकने वाली एक सेमीकंडक्टर डिवाइस होती है. ट्रूनॉर्थ नाम की एक नई तरह की चिप पैटर्नस् को पहचानने और अलग तरह की चीजों के बीच भेद कर पाने में बहुत अच्छी साबित हुई है.

Science intelligent mini-robots
रेंगने वाले रोबोट
कई कंप्यूटर वैज्ञानिकों ने रोबोटों में 'स्वॉर्म इंटेलिजेंस' को बेहतर बनाने पर काम किया है. इसका अर्थ है बिना इंसानी मदद के कई सारे रोबोटों के बीच एक दूसरे के साथ मिलकर कुछ बना पाने की क्षमता.

Science mini-Satellites Archive 2009
छात्रों के सैटेलाइट
इस तस्वीर में छात्र अपने खुद बनाई मिनी-सैटेलाइट पर काम पूरा कर रहे हैं. साल 2014 में ही करीब 75 ऐसी सैटेलाइटों को धरती के पास वाले ऑर्बिट में भेजा गया. इनमें से हर सैटेलाइट किसी खास शोध को करने में बहुत अच्छी रही लेकिन इनमें बहुत सारे उपकरणों को लगाने की संभावना नहीं.

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पहला मेंढक जो अंडे नहीं बच्चे देता है

वैज्ञानिकों को इंडोनेशियाई वर्षावन के अंदरूनी हिस्सों में एक ऐसा मेंढक मिला है जो अंडे देने के बजाय सीधे बच्चे को जन्म देता है.

Der Israelische Scheibenzüngler

एशिया में मेंढकों की एक खास प्रजाति 'लिम्नोनेक्टेस लार्वीपार्टस' की खोज कुछ दशक पहले इंडोनेशियाई रिसर्चर जोको इस्कांदर ने की थी. वैज्ञानिकों को लगता था कि यह मेंढक अंडों की जगह सीधे टैडपोल पैदा कर सकता है, लेकिन किसी ने भी इनमें प्रजनन की प्रक्रिया को देखा नहीं था. पहली बार रिसर्चरों को एक ऐसा मेंढक मिला है जिसमें मादा ने अंडे नहीं बल्कि सीधे टैडपोल को जन्म दिया. मेंढक के जीवन चक्र में सबसे पहले अंडों के निषेचित होने के बाद उससे टैडपोल निकलते हैं जो कि एक पूर्ण विकसित मेंढक बनने तक की प्रक्रिया में पहली अवस्था है. टैडपोल का शरीर अर्धविकसित दिखाई देता है.
इसके सबूत तब मिले जब बर्कले की कैलिफोर्निया यूनीवर्सिटी के रिसर्चर जिम मैकग्वायर इंडोनेशिया के सुलावेसी द्वीप के वर्षावन में मेंढकों के प्रजनन संबंधी व्यवहार पर रिसर्च कर रहे थे. इसी दौरान उन्हें यह खास मेंढक मिला जिसे पहले वह नर समझ रहे थे. गौर से देखने पर पता चला कि वह एक मादा मेंढक है, जिसके साथ करीब एक दर्जन लिसलिसे से बच्चे हैं.मैकग्वायर की यह रिसर्च साइंस पत्रिका 'प्लोस वन' में छपी है. वह बताते हैं, "दुनिया भर लगभग सभी मेंढकों में यानि करीब 6,000 से ज्यादा प्रजातियों में बाहरी निषेचन ही होता है. लेकिन यह मेंढक उन 10 या 12 प्रजातियों में से है जिनमें आंतरिक निषेचन होता है. उनमें से भी यह एकलौता ऐसा है जो बच्चे को जन्म देता है. जबकि बाकी मेंढक निषेचित अंडे देते हैं."
अफ्रीकी देशों में पाए जाने वाले कुछ मेंढकों में भी आंतरिक निषेचन होता है और वे फ्रॉगलेट को जन्म देते हैं जो कभी टैडपोल अवस्था से नहीं गुजरते. यूनीवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया से जारी बयान के मुताबिक कुछ मेंढक अंडों को पीछे की थैली में या मुंह के अंदर थैली में रखते हैं. पहले मेंढकों की दो ऐसी प्रजातियां भी मिली हैं जो बच्चे निकलने तक अंडों को खुद अपने ही पेट में रखते थे. अब खत्म हो चुकी मेंढक की इस किस्म में वे अपने निषेचित अंडों को खुद ही निगल जाते और तैयार हो जाने पर उन्हें मुंह से ही फ्रॉगलेट के रूप में बाहर निकालते थे. sabhar :http://www.dw.de/