Vigyan India.com (विज्ञान इंडिया डाट कॉम ): क्या ब्रमांड मे अनेक विश्व है
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क्या ब्रमांड मे अनेक विश्व है


photo : google photo


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हमारे पौराणिक एवं धार्मिक पुस्तको  मे अनन्त सृष्टि की कल्पना की  गयी है | ईश्वर को अनन्त माना गया है , और उसकी लीलाओ को अनन्त कहा गया है | धर्म के अनुसार ईश्वर का वास हर कण मे है और उसकी माया अनन्त है  विज्ञान भी अब एक से ज्यादे विश्‍व को मानने लगा है | राजर पेनरोज़ जो की गणितग्य है  लेकिन खगौल विज्ञान मे उनका महत्वा पूर्ण योगदान है | उन्होने अपनी पिछली पुस्तक "द एम्पर्स न्यू माएंड " मस्तिष्क और चेतना को लेकर थी , जी बहूत चर्चित हुई थी |उनकी नयी किताब " साएकल्स आफ टाईम : एन  एक्सट्रा आर्डनरी न्यू आफ द यूनिवर्स " मे नयी अवधारणा के मुताबिक  ब्रमांड अनन्त है वह कभी नष्ट नहीं होता उसमे उसमे अनन्त कल्पो के चक्र एक  के बाद आते रहते है |आम तौर पर विज्ञान मे प्रचलित है की  सृष्टि का आरंभ एक विग बैक  या बड़े विस्फोट से हुई है , इसके बाद ब्रमांड फैलता गया  जो अब भी फैल रहा है  एक समय के बाद ब्रमांड के फैलने की उर्जा समाप्त हो जायेगी और ब्रमांड पुनः छोटे से बिन्दु पे आ जायेगी | पेनरोज़ की अवधारणा इससे विल्कुल अलग है  वह समय के चक्र की अवधारणा सामने रखते है  उनका कहना है की  एक 'एओन ' या कल्प की समाप्ति ब्रमांड की ऊर्जा खत्म होने के साथ होती है पर ब्रमांड सिकुड़ कर खत्म नहीं हो जाता ऊर्जा खत्म होने से  ब्रमांड की मास या द्रब्यमान समाप्त हो जाता है, द्रब्यमान समाप्त होने से  समय काल मे कोई भेद नहीं रह जाता |जब मास ही नहीं होता  तो भूत भविष्य , छोटा बड़ा ये सारी अवधारणाये खत्म हो जाती है एक अर्थ मे ब्रमांड की अपनी विशालता की स्मृति खत्म हो जाती है , तब यह अंत अगले बिग बैंक की शुरूआत होती है |और यह अनन्त काल तक जारी रहता है  इसके लिये उन्होने कयी प्रमाण दिये है हालांकि वो कहते है की इसमे अभी और काम करने की आवश्कता है क़्वाण्टम मेकेनिक्स से भी से भी अनेक सृष्टि की अवधारणा मिलती है | भौतिक के स्ट्रिंग सिधांत के अनुसार चार आयाम के अलावा भी कई आयाम है ये सारे आयाम हमारी दुनिया मे कयी दुनिया बनाते है  और इन दुनियाओ का आपस मे सम्बंध गुरुत्वा कर्षण के कारण होता है | जो तमाम स्तरों पर एक ही होता है  तो  क्या   वैज्ञानिक कही ना कही ईश्वर की  अवधारणा  को स्वीकार तो नहीं कर रहे स्वय विचार करे | REF : hindustaan dainiki , dainik jagaran 

CELL AS A BASIC UNIT OF LIFE