30 सेकंड के फर्क ने मिटा दिया था डायनसोर युग का वजूद

30 seconds caused end of dinosaurs from earth, reveals bbc documentary
डायनासोर युग के अंत के लिए कहा जाता है कि एक बहुत बड़ा ऐस्टरॉइड धरती से टकराया था जिससे पैदा हुए विस्फोट ने इन विशालकाय जानवरों का वजूद खत्म कर दिया। लेकिन इस विस्फोट की टाइमिंग को लेकर बीबीसी की एक डॉक्युमेंट्री में बहुत दिलचस्प तथ्य सामने आया है। द डे डायनासोर डाइड नाम की इस डॉक्युमेंट्री में बताया गया है कि जिस ऐस्टरॉइड ने डायनासोरों का अंत किया, अगर वह धरती से 30 सेकंड जल्दी (पहले) या 30 सेकंड देर (बाद) से टकराता तो उसका असर जमीनी भूभाग पर इतना कम होता कि डायनासोर खत्म नहीं होते। ऐसा इसलिए क्योंकि 30 सेकंड की देरी या जल्दी गिरने की स्थिति में वह जमीन की बजाय समुद्र में गिरता।

यह ऐस्टरॉइड 6.6 करोड़ साल पहले मेक्सिको के युकटॉन प्रायद्वीप से टकराया था जिससे वहां 111 मील चौड़ा और 20 मील गहरा गड्ढा बन गया था। वैज्ञानिकों ने इस गड्ढे की जांच की तो वहां की चट्टान में सल्फर कम्पाउन्ड पाया गया। ऐस्टरॉइट की टक्कर से यह चट्टान वाष्प में बदल गई थी जिसने हवा में धूल का बादल बना दिया था। इसके परिणामस्वरूप पूरी धरती नाटकीय रूप से ठंडी हो गई और पूरे एक दशक तक इसी स्थिति में रही। उन हालात में अधिकतर जीवों की मौत हो गई। उनमें डायनसोरों की मौत विस्फोटक के चलते पैदा हुई सुनामी के कारण खाने की चीजों के अंत होने या आसामान से गिरीं पिघली चट्टानों की वजह से नहीं हुई थी।
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जल्द खत्म हो जाएगी इंसानी खून की किल्लत

limitless blood supplies to become a reality soon, claims scientists
वैज्ञानिकों की मानें, तो आने वाले दिनों में किसी भी मरीज के इलाज में खून की कमी नहीं होगी। वैज्ञानिकों का कहना है कि जल्द ही वे इलाज में जरूरत पड़ने वाले खून की बेशुमार मात्रा सप्लाइ कर पाएंगे। मौजूदा समय में लोगों को चिकित्सा कारणों से जब खून की जरूरत पड़ती है, तो ब्लड की किल्लत के कारण उन्हें काफी परेशानी उठानी पड़ती है। ब्लड डिसऑर्डर्स और कई अन्य बीमारियों में लोगों को बड़ी मात्रा में खून चढ़ाना पड़ता है। लंबे शोध के बाद वैज्ञानिक वयस्क कोशिकाओं को मूल कोशिकाओं में बदलने में कामयाब हुए हैं। ये मूल कोशिकाएं की भी तरह की रक्त कोशिकाएं बनाने में सक्षम होंगी। 

पिछले करीब 20 साल से वैज्ञानिक यह पता करने की कोशिश कर रहे थे कि क्या इंसान के खून में कृत्रिम तौर पर मूल कोशिकाओं का निर्माण किया जा सकता है। मूल कोशिकाएं शरीर में किसी भी तरह की कोशिकाएं बना सकती हैं। अब शोधकर्ताओं की एक टीम को अलग-अलग तरह की कोशिकाओं को मिलाने में सफलता मिली है। इनमें रक्त की मूल कोशिकाएं भी शामिल हैं। जब इन कोशिकाओं को चूहे के शरीर में डाला गया, तो उन्होंने अलग-अलग तरह की इंसानी रक्त कोशिकाओं का निर्माण किया। 

अमेरिका के बॉस्टन चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल में पोस्टडॉक्टरल शोधकर्ता डॉक्टर योइचि सुगिमुरा ने बताया, 'इस शोध की मदद से हम खून की वंशानुगत बीमारियों से जूझ रहे मरीजों की कोशिकाएं ले सकते हैं और जीन एडिटिंग की मदद से उनके डिसऑर्डर को ठीक करके स्वस्थ रक्त कोशिकाएं तैयार कर सकते हैं। साथ ही, इसके कारण रक्त की मूल कोशिकाओं की अबाध आपूर्ति भी संभव हो सकती है।' हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के प्रमुख और सुगिमुरा के साथी शोधकर्ता डॉक्टर जॉर्ड डेली ने कहा, 'हम शायद जल्द ही स्वस्थ और प्रामाणिक इंसानी रक्त तैयार करने में कामयाब हो जाएंगे। 20 सालों की मेहनत के बाद हम इस मकाम तक पहुंचे हैं।'
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समय क्या है ? समय का निर्माण कैसे होता है?


भौतिक वैज्ञानिक तथा लेखक पाल डेवीस के अनुसार “समय” आइंस्टाइन की अधूरी क्रांति है। समय की प्रकृति से जुड़े अनेक अनसुलझे प्रश्न है।
  • समय क्या है ?
  • समय का निर्माण कैसे होता है ?
  • गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से समय धीमा कैसे हो जाता है ?
  • गति मे समय धीमा क्यों हो जाता है ?
  • क्या समय एक आयाम है ?
अरस्तु ने अनुमान लगाया था कि समय गति का प्रभाव हो सकता है लेकिन उन्होने यह भी कहा था कि गति धीमी या तेज हो सकती है लेकिन समय नहीं! अरस्तु के पास आइंस्टाइन के सापेक्षतावाद के सिद्धांत को जानने का कोई माध्यम नही था जिसके अनुसार समय की गति मे परिवर्तन संभव है। इसी तरह जब आइंस्टाइन साधारण सापेक्षतावाद के सिद्धांत के विकास पर कार्य कर रहे थे और उन्होने क्रांतिकारी प्रस्ताव रखा था कि द्रव्यमान के प्रभाव से अंतराल मे वक्रता आती है। लेकिन उस समय आइंस्टाइन  नही जानते थे कि ब्रह्माण्ड का विस्तार हो रहा है। ब्रह्माण्ड के विस्तार करने की खोज एडवीन हब्बल ने आइंस्टाइन द्वारा “साधारण सापेक्षतावाद” के सिद्धांत के प्रकाशित करने के 13 वर्षो बाद की थी। यदि आइंस्टाइन को विस्तार करते ब्रह्माण्ड का ज्ञान होता तो वे इसे अपने साधारण सापेक्षतावाद के सिद्धांत मे शामील करते। अवधारणात्मक रूप से विस्तार करते हुये ब्रह्माण्ड मे गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव के फलस्वरूप धीमी गति से विस्तार करते हुये क्षेत्र के रूप मे अंतराल की वक्रता दर्शाना ज्यादा आसान है। हमारे ब्रह्माण्ड के सबसे नाटकीय पहलुंओ मे एक यह है कि उसका विस्तार हो रहा है और विस्तार करते अंतराल मे गति, बल तथा वक्र काल-अंतराल की उपस्थिति है।
अगले कुछ अनुच्छेदों मे हम देखेंगे कि समय एक आकस्मिक अवधारणा है। ( time is an emergent concept.) गति तथा बलों की प्रक्रियाओं के फलस्वरूप समय की उत्पत्ति होती है, लेकिन जिसे हम समय मानते है, वह एक मरिचिका या भ्रम मात्र है। हमारी स्मृति भूतकाल का भ्रम उत्पन्न करती है। हमारी चेतना हमारे आसपास हो रही घटनाओं के फलस्वरूप वर्तमान का आभास उत्पन्न करती है। भविष्य हमारी भूतकाल की स्मृति आधारित मानसीक संरचना मात्र है। समय की अवधारणा हमारे मन द्वारा हमारे आसपास के सतत परिवर्तनशील विश्व मे को क्रमिक रूप से देखने से उत्पन्न होती है।
जान एलीस मैकटैगार्ट तथा अन्य दार्शनिको के अनुसार समय व्यतित होना एक भ्रम मात्र है, केवल वर्तमान ही सत्य है। मैकटैगार्ट समय के विश्लेषण की A,B तथा C श्रृंखलांओ के लिये प्रसिद्ध है। इस समय विश्लेषण का साराशं नीचे प्रस्तुत है:
  • समय के पूर्व और पश्चात के पहलू मूल रूप से समय के तीर(arrow of time) के रूप में ही है। किसी व्यक्ति का जन्म उसकी मृत्य से पूर्व ही होगा, भले ही दोनो घटनाये सुदूर अतीत का भाग हो। यह एक निश्चित संबध है; इस कारण मैकटैगार्ट कहते है कि कहीं कुछ समय से भी ज्यादा मौलिक होना चाहीये।
  • समय के भूत, वर्तमान और भविष्य के पहलू सतत परिवर्तनशील है, भविष्य की घटनायें वर्तमान मे आती है तथा तपश्चात भूतकाल मे चली जाती है। यह पहलू समय की एक धारा का एहसास उत्पन्न कराता है। यह सतत परिवर्तनशील संबध समय की व्याख्या के लिए आवश्यक है। मैकटैगार्ट ने महसूस किया कि समय वास्तविक नही है क्योंकि भूत, वर्तमान और भविष्य के मध्य का अंतर(एक सतत परिवर्तनशील संबंध) समय के लिये पूर्व और पश्चात के स्थायी संबध की तुलना मे ज्यादा आवश्यक है।

स्मृति के रूप मे समय

मैकटैगार्ट का सबसे महत्वपूर्ण निरीक्षण यह था कि ऐतिहासिक घटनाओं तथा मानवरचित कहानीयों मे समय के गुण एक जैसे होते है। उदाहरण के लिये मानवरचित कहानीयों तथा भूतकाल की ऐतिहासीक घटनाओं की तुलना करने पर, दोनो मे पूर्व और पश्चात के साथ भूत, वर्तमान और भविष्य होता है, यह दर्शाता है कि भूतकाल घटनाओं की स्मृति मात्र है तथा लेखक की कल्पना के अतिरिक्त उसका अस्तित्व नही है। यदि हम कंप्युटर की स्मृति उपकरण जैसे सीडी या हार्डडीस्क मे संचित भूत, वर्तमान और भविष्य के बारे मे सोचें तो यह और स्पष्ट हो जाता है।

वर्तमान : एक अत्यंत लघु क्षण ?

वर्तमान अत्यंत लघु क्षण होता है।
वर्तमान अत्यंत लघु क्षण होता है।
वर्तमान” यह समय की सबसे ज्यादा वास्तविक धारणा है, लेकिन हम जिसे वर्तमान के रूप मे देखते है वह पहले ही भूतकाल हो चुका होता है। वर्तमान क्षणभंगुर है, जो भी कुछ वर्तमान मे घटित हो रहा है वह समय रेखा पर एक अत्यंत लघु बिंदु पर सीमित है और उस पर सतत रूप से हमारे भूत और भविष्य का अतिक्रमण हो रहा है।
वर्तमान किसी रिकार्डींग उपकरण का तीक्ष्ण लेज़र बिंदु या सुई है। जबकि भूत रिकॉर्डिंग माध्यम जैसे टेप या सीडी का उपयोग किया भाग है तथा भविष्य उसका रिक्त भाग।
वर्तमान हमारे मस्तिष्क मे संचित स्मृति की मानसीक जागरुकता हो सकती है। कोई व्यक्ति किसी कार्यक्रम मे जाकर भी यदि सो जाये तो वह उस घटना को पूरी तरह से भूल सकता है। अब उस घटना का उसके भूतकाल मे अस्तित्व ही नही है। यदि हम किसी घटना के प्रति चेतन न हो तो वह हमारे भूतकाल की स्मृति का भाग नही बनती है।

भूत और भविष्य समय के अंतराल है।

भूत और भविष्य समय के अंतराल है।
भूत और भविष्य समय के अंतराल है।
वर्तमान के विपरीत हम भूत और भविष्य को घंटो, दिनो, महीनो और वर्षो मे मापे जा सकने वाले के अंतराल के रूप मे देखते है।
भूतकाल की ऐतिहासिक घटनायें, भविष्य मे होने वाली शादी या कोई अन्य घटना सभी मापे जा सकने वाले अंतराल मे है, किसी रीकार्डींग वस्तु जैसे टेप, वीडीयो या किसी सीडी/डीवीडी के ट्रेक के जैसे।
यह समानता दर्शाती है कि भूतकाल संचित स्मृति के जैसे है, जबकि भविष्य रिक्त स्मृति के जैसे। भविष्य हमारी स्मृति मे संचित भूतकाल के अनुभवो से निर्मित छवि मात्र है।

समय का मापन

किसी भी भौतिक राशी जैसे पैसा, द्रव्यमान, जमीन का टूकड़ा, गति, दूरी या प्रतिरोध का मापन हमारे द्वारा परिभाषित कुछ मानको द्वारा किया जाता है। द्रव्यमान के मापन के लिये हम किलोग्राम या पौंड जैसे मानको का उपयोग करते है। दूरी के मापन के लिये हम दूरी के मानक मीटर, यार्ड या फीट का प्रयोग करते है। इन्हे ध्यान मे रखते हुये ध्यान दिजीये कि हम गति का मापन कैसे करते है! हम गति के मापन के लिये समय का प्रयोग करते है अर्थात मीटर प्रति सेकंड या किलोमीटर प्रति घंटा। इससे एक संकेत मिलता है कि जब हम समय से व्यवहार करते है, वास्तविकता मे हम किसी गति के किसी मानक से व्यवहार कर रहे होते है।
शायद हमने समय की संकल्पना वास्तविकता से ज्यादा जटिल बना दी है। समय का मापन मानव विकास की प्रारंभिक अवस्था से प्रारंभ हुआ है। इसके संकेत लगभग हर भाषा मे अभिवादन के शब्दो मे मिलते हैं। दिन मे समय सूर्य के आकाश मे स्थिती या अनुपस्थिति से संबधित था। इसमे प्रभात, सूर्योदय, सुबह,दोपहर, शाम, सूर्यास्त, रात, अर्धरात्री शामील है। इसके पश्चात वर्ष, माह, सप्ताह पृथ्वी की सूर्य की कक्षा मे वार्षिक परिक्रमा तथा मौसम मे परिवर्तन पर आधारित है। सेकंड और मिनिट जैसी इकाईयों का प्रयोग ज्यामिती मे कोणीय मापन पर आधारित है, जोकि वास्तविकता मे आकाश मे खगोलीय पिंडो की गति के कोणीय मापन से संबधित विधि है। जब से हमने घड़ीयों का प्रयोग प्रारंभ किया है हम समय मापन की इन प्राकृतिक विधियों से दूर हो गये है और समय की अवधारणा विकृत हो गयी है।
समय का मापन
समय का मापन
समय को समझने की समस्या का सरल हल सूर्य के आकाश मे भ्रमण द्वारा समय के मापन विधि की ओर वापिस लौटने मे है। जब हम कार की गति का मापन करते है तब हम उसकी गति की तुलना घड़ी के कांटो की गति से करते है, अप्रत्यक्ष रूप से हम यह तुलना सूर्य की आकाशीय गति से करते है। हम गति का मापन समय के जैसे किसी अमूर्त राशी से नही कर रहे है, हम अज्ञात गति (कार) की तुलना ज्ञात गति (सूर्य की आकाशीय गति) से कर रहे होते है।

गति की इकाई के रूप मे समय

समय विभिन्न तरह की गतियों की तुलना के लिये इकाई के रूप मे प्रयुक्त होता है, जैसे प्रकाशगति, हृदयगति, पृथ्वी की अपने अक्ष पर घूर्णन गति। लेकिन इन प्रक्रियाओं की तुलना समय के संदर्भ के बीना भी की जा सकती है। समय गति के मापन के लिए एक सामान्य इकाई हो सकता है, जिससे सारे विश्व मे एक इकाई से गति के मापन मे आसानी होगी। यह एक ऐसी इकाई होगी जिसका स्वतंत्र अस्तित्व नही है। गतिक प्रक्रिया का समय के रूप मे मापन की तुलना व्यापार मे करेंसी(मुद्रा) के प्रयोग से की जा सकती है। ध्यान दें कि यहाँ भी समय की उपस्थिति अर्थात गति की उपस्थिति की अवधारणा की पुष्टि हो रही है।

वास्तविक रूप से समय क्या है ?

समय एक आकस्मिक अवधारणा है। वह हमारे जीवन मे सतत परिवर्तित होने वाली वास्तविक घटना है। समय को समझने के लिये हमे इस सतत परिवर्तन को निर्मित करने वाली प्रक्रिया को समझना होगा जिससे समय के प्रवाह का भ्रम उत्पन्न होता है।
समय गति से दृष्टिगोचर होता है और उसका मापन अन्य गति से तुलना के द्वारा होता है।, सूर्योदय, सूर्यास्त, रात और दिन, बदलते मौसम, खगोलीय पिंडो की गति यह सभी सतत परिवर्तन के प्रमाण हैं। उम्र बढ़ने की प्रक्रिया भी हमारी आण्विक गति तथा प्रक्रिया भी गति का प्रभाव है और समय का ही भाग है। इसके अतिरिक्त समय कि उपस्थिति का एक महत्वपूर्ण पहलू फोटान और परमाण्विक स्तर पर कणो की गति भी है।

एक मानसीक प्रयोग

दो खगोलीय पिंडो की कल्पना किजीये, जिसमे एक पिंड दूसरे की परिक्रमा कर रहा है। अब मान लीजीये कि एक दूरस्थ निरीक्षण बिंदु से एक निश्चित समय पर हम पाते हैं कि उन दोनो पिंडो वाले क्षेत्र मे समय धीमा हो गया है। समय के धीमे होने से पिंडो की गति भी धीमी होना चाहीये। इस निरीक्षण मे गुरुत्वाकर्षण बल भी अनुपातीक रूप से कमजोर होना चाहीये अन्यथा दो पिंड एक दूसरे की ओर खिंचे जायेंगे। यदि हम समय की गति मे वृद्धि देखते है, तब गति मे भी वृद्धी होगी, साथ ही गुरुत्वाकर्षण मे भी वृद्धी होगी जो उन पिंडो को एक दूसरे से दूर जाने से रोकेगा। वहीं शून्य समय गति पर सब कुछ शून्य हो जायेगा अर्थात पिंडो की गति और गुरुत्वाकर्षण शून्य हो जायेगा।
गुरुत्वाकर्षण बल की क्षमता मे वृद्धी या कमी केवल हमारे निरीक्षण बिंदु के निश्चित समय से संबधित है। परिक्रमा करते पिंडो के समय के परिपेक्ष मे ना तो उनकी गति मे परिवर्तन हुआ है ना उनके गुरुत्वाकर्षण मे। इस मानसीक प्रयोग को विद्युत-चुंबकीय बल द्वारा बांधे गये कणो पर भी कीया जा सकता है, तब हम कह सकते है कि समय बल और गति दोनो का समावेश करता है।

समय की संभावित परिभाषा

ठहरा हुआ समय
ठहरा हुआ समय
समय को एकाधिक परिपेक्ष्य मे परिभाषित किया जा सकता है।
ज्ञान के परिपेक्ष्य से समय हमारे मस्तिष्क  द्वारा निर्मित एक आकस्मिक अवधारणा है। वर्तमान हमारी चेतना या हमारी स्मृति मे घटनाओ के लेखन की जानकारी है। भूतकाल स्मृति है जबकि भविष्य का अस्तित्व नही है।
भौतिकशास्त्र के परिपेक्ष्य मे, समय ब्रह्मांड मे गति और बलो की उपस्थिती है।
समय हर तरह की गति का समावेश करता है। कणो की स्पिन तथा फोटान की गति भी समय पर निर्भर है। गुरुत्वाकर्षण बल, विद्युत-चुंबकिय बल भी समय का भाग है, उसी तरह से खगोलीय पिंडो की गति, परमाणुओं की गति भी। हमने इस लेख मे समय की अवधारणा को आंशिक रूप से समझा है। sabhar https://vigyanvishwa.in

पुरातन ज्ञान के खण्डहरों पर खड़ा है आज का विज्ञान

प्राचीन काल ज्ञान विज्ञान की दृष्टि से कितना समृद्ध था, इसका अनुमान तब के सुविकसित यंत्र उपकरणों एवं वास्तुशास्त्र से संबंधित अद्भुत निर्माणों से लगाया जा सकता है। आज तो उनकी हम बस कल्पना ही कर सकते है। यथार्थतः ज्ञान और विज्ञान को समझने में तो शायद सदियों लगा जाएँ।
आर्ष उल्लेखों से ऐसा ज्ञात होता है कि प्राचीन समय के दो मूर्धन्य वैज्ञानिकों-वास्तु विदों में त्वष्टा एवं मय अग्रगण्य थे। त्वष्टा एवं मय अग्रगण्य थे। अर्थात् विश्वकर्मा देवों के विज्ञानवेत्ता थे। और तरह तरह के आश्चर्यचकित करने वाले शोध अनुसंधानों सदा संलग्न रहते थे,। जबकि मय, विश्वकर्मा के प्रतिद्वंद्वी और असुरों की सहायता में निरत रहते थे। उनके उपकरण देवों पर विजय प्राप्ति हे दानवों के लिए होते थे। या तो विश्वकर्मा को संपूर्ण सृष्टि का रचयिता माना गया है। (विश्वकर्मन नमस्तेऽस्तु विशत्मन् विश्वसंभव) महाभारत शान्ति पर्व 47/75 किन्तु वे चिरपुरातन विधा वास्तु शास्त्र के प्रथम उपदेष्टा एवं प्रवर्तक आचार्य के रूप में अधिक विख्यात है। राजा भोजकृत ‘ समराँगण सूत्रधार के तीसरे अध्याय प्रश्नध्याय में खगोल विज्ञान मनोविज्ञान एवं शिल्प शास्त्र से संबंधित उन 60 प्रश्नों का वर्ण है।, जिसे विश्वकर्मा के ज्येष्ठ पुत्र जय अथवा सन्निवेश ने अपने पिता से पूछा था। ऐसे कहा जाता है कि उनका साठ प्रश्नों में उपर्युक्त सभी विधाओं विशेषकर शिल्पशास्त्र के संपूर्ण रहस्यों का समावेश है, जिनके विस्तृत उत्तर देकर त्वष्टा ने उन विधाओं का हस्तांतरण अपने पुत्र को किया था। बाद में इन्हीं जय ने वास्तुविज्ञान का विश्वविद्यालय स्थापित कर विधा को सर्वसुलभ ऋग्वेद के दशम मण्डल के 71 वाँ और 72 मुक्त विश्वकर्मा मुक्त है। ये भी अद्भुत बात है कि इन मुक्तकों के द्रष्टा और स्तोत्र भी विश्वकर्मा ही है। ऐसा अन्य सूक्तों नहीं देखा में नहीं देखा गया। ऋग्वेद (1/75/1) में उन्हें अत्यन्त निपुण मेधा संपन्न, कुशल शिल्पी कहा गया है। जो थोड़े समय में दिव्य शस्त्रास्त्रों के निर्माण में पारंगत है। चित्रकला, वास्तुकला, भित्तिकला के भी वे ज्ञाता है। तथा इनके प्रवर्तक आचार्य भी। वे कितने बड़े एवं निष्णात विज्ञानवेत्ता थे इसकी एक हल्की झाँकी ऋग्वेद एक मंत्र में करायी गई है उसमें कहा गया है- बाशीमेको विभर्ति हस्त आयासीमंतदेवेष निध्रुवविः। भाष्यकारों के अनुसार यहाँ आयोमय वाशी कोई बहुद्देशीय और बहुकार्यक्षम कुल्हाड़ा जैसा उपकरण है, जो उनके हाथ में सदा मौजूद रहता है। इससे वे शत्रुसंहार एवं संपूर्ण अपरा विद्या के संपादन का उभयपक्षीय प्रयोजन साथ-साथ पूरा करते हैं संभवतः इस हस्त कौशल के कारण ही उन्हें सुपाणि जैसा संज्ञा दी गई है। विश्वकर्मा शिल्प शास्त्र मयमतम् यह तकनीकी ज्ञान और विज्ञान के दो अद्वितीय ग्रंथ है। एक में त्वष्टा के शिल्प विद्या का वर्णन है तो दूसरे में मयकूज आविष्कारों का उल्लेख। इन ग्रन्थों को पढ़कर यह जाना जा सकता है कि पदार्थ विज्ञान के यह आदि पुरोधा कितने सूक्ष्म और उच्चस्तरीय ज्ञानसम्पन्न थे। दोनों ने ऐसे ऐसे यंत्र-उपकरणों का निर्माण किया था, जिन्हें चमत्कार से कम नहीं कहा जा सकता। इन्हीं में एक पुष्पक विमान यह विमान बहुत अद्भूतं था। पुष्पों और लताओं से निर्मित इस विमान की यह विशेषता थी कि वह आवश्यकतानुसार फैल और सिकुड़ सकता था। समय आपने पर वह व्यक्ति के बैठने जितना छोटा हो जाता था और जरूरत पड़ने पर विस्तृत होकर पूरे नगर को अपने अंदर समेट सकता था। इसकी रचना ब्रह्म के निर्देश पर विश्वकर्मा ने कुबेर ने कुबेर के लिये की थी। कुबेर उस जमाने में बहुत बड़े धनिक और गन्धर्वों के राजा थे उनकी राजधानी अलकनन्दा के उद्गम स्थल के निकट अलकापुरी में थी। रावण की दृष्टि जब कुबेर के इस अनूठे आकाशचारी यंत्र पर पड़ी तो उसने आक्रमण कर उसको छीन लिया रावण के पतन के बाद विभीषण ने उसे भगवान राम को सौंप दिया। सम्पूर्ण सेना उसी विमान सवार होकर आकाश मार्ग से अयोध्या आई थी कुछ समय तक निजी प्रयोजनों के लिए उसका इस्तेमाल करने के उपरान्त भगवान ने कुबेर को लौटा दिया।
यों तो यह किसी कल्पनाशील लेखक की काल्पनिक उड़ान सी लगती है।, पर आर्ष वांग्मय में उसके अनेक अस्त्र-आयुधों का उल्लेख है। जिसे आज के विकसित विज्ञान के युग में भी यथार्थ के धरातल पर उतार पाने की बात से दूर उसे सिद्धान्त रूप में स्वीकार कर पाने में भी कठिनाई महसूस हो रही है। इसका यह मतलब नहीं कि तब के सारे उल्लेख कोरी कल्पना मात्र है। आज से पाँच सौ वर्षों पूर्व आज के वैमानिकी यंत्रों को कल्पना कदाचित किसी की होगी। यदि उस समय का कोई व्यक्ति संप्रति जीवित होता है तो यह दुनिया और उसकी वैज्ञानिक प्रगति उसके लिये बहुत बड़ा अजूबा प्रतीत होती है। इतने पर भी आँखों से दिखाई पड़ने वाले सच को नकारा तो नहीं जा सकता है। कुछ ऐसा ही असमंजस वर्तमान मनुष्यों के समक्ष पुराविज्ञान के संदर्भ में उपस्थित हुआ है। उससे न तो दिव्य पुराउपकरणों को ठीक ठीक स्वीकारते बन पड़ रहा है, न नकारते। स्थिति बड़ी दुविधापूर्ण है। फिर भी विज्ञान संबंधी वर्तमान अनुसंधान और विकास में इस बात के संकेत मिल रहे है कि अपरवित्या के उस उत्कर्ष काल में संभव ऐसे दिव्य उपकरण अस्तित्व में रहे हो। जो वर्तमान ज्ञान परिधि से परे है।
पिछले दिनों अमेरिका ने टाँम केट नामक एक ऐसा वायुयान बनाया है जिसे प्राचीन पुष्पक विमान का अर्वाचीन संस्करण कह सकते है। अर्थात् उसमें संकुचन और प्रसार जैसी दोनों ही क्षमताएँ है। वह दो सीटों वाले वायुयान जितना छोटा भी हो सकता है। और इतना बड़ भी पूरा शहर समा जायें और महीनों ऊपर उड़ता रहे। सौर ऊर्जा और परमाणु शक्ति चलित विमान अमेरिका बना चुका है। अन्तर्ग्रही शटल की बात अब पुरानी पड़ चुकी है। इन सारे निर्माणों से ऐसा प्रतीत होता है कि पुष्पक विमान और सौर ऊर्जा और वनस्पति चेतना से चलित कोई यान रहा होगा। वनस्पति ऊर्जा का मूल स्रोत और सौर ऊर्जा भी है। इसलिये लता पुष्पों से निर्मित उस विमान में आक्सीजन और वातानुकूलक जैसी आवश्यकताओं की पूर्ति वनस्पतियों से होती होगी। जबकि उड्डयन का मूल प्रयोजन सौर ऊर्जा से पूरा होता होगा। ऐसे ही एक अन्य विलक्षण यंत्र का आविष्कार विश्वकर्मा ने किया था। लता यंत्र नामक यह उपकरण शत्रुओं अथवा अपराधियों को जकड़ने के काम आता था। वामन पुराण में में एक मिथक है। कि विश्वकर्मा की पुत्री चित्रगन्धा और राजा सूरत एक दूसरे को चाहते थे और परस्पर विवाह करने के इच्छुक थे। लेकिन त्वष्टा ने इसकी अनुमति नहीं दी। तब चित्रागन्धा मुनि ऋतध्वज के पास पहुँची और पिता के क्रोध की चर्चा करते हुए समस्या के हल के लिये मनुहार किया। ऋग्ध्वज तपस्वी और वाक्-सिद्ध थे। उनने विश्वकर्मा को वानर (वनवासी) बनने के श्राप दिया। पुत्री अत्याचार का शायद या सामाजिक दण्ड था। कि उन्हें नगर त्याग कर जंगल की शरण लेनी पड़ी। विश्वकर्मा भी इस अन्याय का बदला लिये बिना न रह सके उनने उसके पुत्र जाबालि को लता यंत्र में जकड़ लिया बालक जाबालि जीवित वृक्षों की जटाओं में बंधा असहाय पड़ रहा है। चीख पुकार सुनकर ऋग्ध्वज उसकी सहायता करने को तत्पर हुए उस विद्या ने तनिक भी गति न होने के कारण उसकी कुछ भी मदद न कर सके। अन्ततः तत्कालीन चक्रवर्ती सम्राट इक्ष्वाकु के पास जाकर इसकी शिकायत की उन्होंने ने वृक्ष को काट डालने का आदेश दिया। फिर लताओं का शिकंजा कमजोर नहीं पड़ा। और बालक उससे बुरी तरह जकड़ा रहा। हार कर ऋग्ध्वज को समझौता करना पड़ा उसने अपने पुत्र बंधन मुक्ति के बदलें त्वष्टा के समक्ष शापमोचन का प्रस्ताव रखा। वे सहर्ष तैयार हो गये। इस प्रस्ताव दोनों अपनी समस्याओं से उबर सके। शोध कर्मी वैज्ञानिकों का कहना है कि त्वष्टा निःसन्देह वनस्पति शास्त्र के पारंगत रहे होंगे उन्होंने वनस्पति व्यवहार विज्ञान और वनस्पति चेतना शास्त्र संबंधी सूक्ष्म जानकारी होगी। वे यह भी जानते होंगे कि पौधों के सूख जाने पर उसकी चेतना को प्रदत्त जिम्मेदारी के निर्वहन के लिये कैसे सहमति किया जाये। इन्हीं सभी विशेषताओं का संयुक्त परिणाम लता यंत्र था। आज का विज्ञान इसे बकवास कहकर भले ही अपनी झुझलाहट निकाल ले पर इतने से सत्य बदल नहीं सकता। उक्त आख्यान में वर्णन आता है कि सृष्टि के आरंभ से पूर्व पृथ्वी जीवधारियों के निवास योग्य नहीं थीं। कही ऊँचे पहाड़ तो कही एक दम गहरी घाटियाँ। कही समुद्र तो कही विशाल विवर पृथ्वी सर्वत्र फैले पड़े थे इन्हें जीवन के अनुकूल बनाने के लिये ब्रह्म जी ने राजा पृथु को यह उत्तरदायित्व सौंपा वे आपने अपूर्व पराक्रम से उन्हें समतल बनाने लगे। इससे पृथ्वी को असहाय कष्ट पहुँच रहा था। इसके अतिरिक्त डर यह भी था कि इस प्रक्रिया द्वारा उसका सहज स्वाभाविक रूप कही बिगड़ न जाये व गौ का रूप धर कर ब्रह्मा जी के पास गुहार करने गयी। उसकी शिकायत थी कि सम्राट बर्बर ध्वंसात्मक तरीका अपना रहे है। शिकायत उचित समझ कर उन्होंने इस कार्य हेतु किसी ऐसे सुविज्ञ और विवेकवान आचार्य की सेवा लेनी चाही जो ऐसा करते समय जीवधारियों के सुख दुख सुविधा असुविधा, प्रकृति तथा पर्यावरण संतुलन एवं यहाँ तक की पृथ्वी को नैसर्गिक सुषमा को कोई हानि न पहुँचे। इन सब बातों को ध्यान में रख सके किंचित् उधेड़ बुन के उपरान्त उनका ध्यान त्वष्टा की ओर गया। वे त्रधशाचार्य (पदार्थ के ठोस तरह और गैस अवस्थाओं की तकनीक ज्ञाता) और शिल्प शास्त्र के आदि प्रवर्तक तो थे ही पृथ्वी को समुन्नत और सुविकसित बनाने में उनकी विशेषज्ञता काम आ सकती है। यह सोच कर ब्रह्मा ने उन्हें भी इन योजना में सम्मिलित कर लिया। पृथु का बल और विश्वकर्मा का कौशल जब एकाकार हेतु पृथ्वी पर सृष्टि संरचना संबंधी उपयुक्त वातावरण बना। पृथधोहन और शोषण के सिद्धान्त परी चल रहे थे। ध्वंस भी शामिल था। त्वष्टा ने अपेक्षा कृत नर्म और विवेक पूर्ण प्रणाली अपनायी उनने निर्माण कोषाधोहन पर बल दिया। उभयपक्षीय पद्धति थी। इसमें पृथ्वी और प्राकृतिक सुरक्षा का भी ध्यान रखा गया था और जीवन समृद्धि का भी इस लिये उनकी यह परम्परा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। जितनी पहले थी। और बाद में भी रहेगी। मानसार नामक ग्रन्थ के 43 वें अध्याय में ऐसे अनेक रथों का वर्णन है। जो वायुवेग से चल कर लक्ष्य तक पहुँचते थे। उनमें बैठा व्यक्ति बिना अधिक समय गवाँए गंतव्य तक पहुँच जाता था। इन सभी के निर्माता विश्वकर्मा थे। अर्जुन के नन्दी होशरथ की पुष्टि भी उनने की थी। व दूर दूर से सूचना संकेत भी ग्रहण करता और सहयोगी सेनापतियों के लिये मात्र पूर्ण सन्देश प्रेषित प्रसारित करता था। व सुविधा दूसरे रथों में नहीं थी। इसके अतिरिक्त अनेक नगरों और उसके सभा भवनों का निर्माण त्वष्टा ने किया था। इन्द्र की राजधानी अमरावती और उसके सुधर्मा सभा भवनों सम्पूर्ण द्वारिकापुरी एवं उसके श्रीकृष्ण सभा भवन धर्मराज युधिष्ठिर इन्द्रप्रस्थ नगरी एवं उसके सभागार की रचना विश्वकर्मा ने ही की थी। इसी सभा भवन में दुर्योधन ने जल को थल और थल को जल समझने की गलती की थी। और द्रौपदी के उपहास का पात्र बना। महाभारत युद्ध में पाँडवों ने जिन अस्त्र शस्त्रों का प्रयोग किया उसके सृजेता त्वष्टा थे। जबकि कौरवों के आयुधों का विकास असुर शिल्पी मय किया था। अक्षय पात्र और अक्षय तुणीर भी विश्वकर्मा के निर्माण थे। अक्षय पात्र सुस्वादु भोजन प्रदान करता था। उसमें भोजन की कभी कमी नहीं पड़ती थी। जबकि अक्षय तुणीर एक ऐसा तस्कर था। जिसमें बाण कभी समाप्त नहीं होते थे। पात्र के खाली होने से पूर्व भर जाने का विज्ञान क्या था। यह शोध का विषय है निश्चय ही इसके पीछे निर्माण आपूर्ति की कोई ऐसी उच्च स्तरीय टेक्नोलॉजी थी। जिसका आज हम सिर्फ अनुमान ही लगा सकते है। विष्णु का चक्र इन्द्र का वृज, शिव का त्रिशूल दुर्गा का भाला, इन सबके रचनात्मक त्वष्टा ही थे। त्रिकोण पर्वत पर स्थित कुबेर की लंका उन्हीं की कृति थी। बाद में जब उस पर असुर राज रावण ने अधिकार कर लिया तब असुर शिल्पी मय ने उसको अधिक भोगपूर्ण स्वर्ण लंका में परिवर्तित कर दिया।
यह त्वष्टा के निर्माण की चर्चा हुयी। प्राचीन काल के दूसरे विज्ञान के रता मय थे उनने भी एक से एक बढ़कर भवनों और आयुधों की सृष्टि की जिन दिनों यह दो मूर्धन्य विज्ञान विसारत अस्तित्व में थे उन दिनों देवों और दानवों में अक्सर युद्ध हुआ करता था। उससे सुरक्षा के लिये असुरों ने दानवों शिल्पी से कुछ विशिष्ट व्यवस्था का आग्रह किया। मय ने भगवान शंकर से सलाह कर तीन विशाल उपग्रहों का निर्माण किया यह आर्य भट्ट रोहिणी या इनसेट श्रेणी के उपग्रहों जितने छोटे नहीं थे इनका विस्तार मीलों में था और व्यवस्थित नगरों के रूप में बने थे। इन्हें त्रिपुर कहा जाता था। आकाश में ये पृथक् पृथक् रहते थे किन्तु आवश्यकता पड़ने परस्पर मिल भी जाते थे। इतना उच्च स्तरीय विज्ञान था। आज जिस प्रकार अंतरिक्ष यान आकाश में एक दूसरे से जुड़ जाते है और फिर अलग हो जाते है। वैसे ही ये मय कृत उपग्रह थे। ऐसा नियम था कि पुष्प नक्षत्र में ही इनका मिलन अंतरिक्ष में होता था। तब तीनों उपग्रहों की निवासी परस्पर विचारों का आदान प्रदान करते अथवा भावी रणनीति बनाते। जब तक यह पृथक् परिभ्रमण करते तब शत प्रतिशत अलग सुरक्षा की गारण्टी होती है। किन्तु मिलनकाल में विनाश का योग बलवती हो उठता था। कारण की उपग्रह द्वारा इसी मध्य खुलते थे। इनका परिक्रमा काल 26 दिनों का होता तब तक यह अंतरिक्ष में घूमते रहते या दूसरे ग्रह-नक्षत्रों की यात्रा करते यदा-कदा धरती पर उतर कर लूट मार करके सुरक्षित उड़ जाते 27 वे दिन कुछ नक्षत्र पर इनका मिलन होता उस दौरान लूट की संपत्ति का बटवारा होता। इस प्रकार जब दिनों दिन उनका अत्याचार बढ़ने लगा तो सभी परेशान हो उठे। अन्त में मयकृत इस संरचना को नष्ट करने की जिम्मेदारी विश्वकर्मा के कंधों पर डाली गयी उन्होंने ने एक ऐसे आकाशगामी रथ का निर्माण किया। जिससे मिसाइलों की तरह शक्तिशाली विध्वंसक बाण चलाये जा सकते हैं सृजन के पश्चात् भगवान शंकर को उस पर बिठाया और निवेदन किया उसे नक्षत्र के दौरान जब उपग्रहों के कपाट खुले तो तत्काल उन पर मिसाइलों-बाणों से हमला कर दें। लोककल्याण के निमित्त उन्होंने वैसा ही किया और मय के उन अद्भुत उपग्रहों को त्रिशूल से विनष्ट कर दिया, पर विज्ञान के उस निष्णात को मरने बचा लिया।
रूस और अमेरिका के छोटे-स्पेस स्टेशन अंतरिक्ष में आज भी प्रदक्षिणारत है। दोनों देशों के वैज्ञानिक उनमें समय समय पर जाकर प्रयोग परीक्षण सम्पन्न करते रहते है। पिछले दिनों दोनों स्टेशनों का परस्पर सफलतापूर्वक मिलन भी हुआ था, जिसके दौरान दोनों राष्ट्रों के वैज्ञानिकों ने अपने प्रयोगों द्वारा उपजा ज्ञान का आदान प्रदान किया इसी से आज गाया जा सकता है कि आज हम वैज्ञानिक विकास की दृष्टि से जहाँ पर खड़े है, उस ऊँचाई और उत्कर्ष को हमारे पूर्व पहले ही प्राप्त कर चुके थे।
मय यंत्र विद के साथ-साथ महान आर्कीटेक्ट भी थे। भवन निर्माण की उनकी रचना शैली का विशद वर्णन ‘मयशिल्पम्’ नामक ग्रंथ में मौजूद है वे मध्य अमेरिका के वर्तमान मैक्सिको देश के मूल निवासी थे। उत्खनन के दौरान प्राप्त मय सभ्यता के अवशेष वहाँ अब भी विद्यमान है।, जिन्हें देखकर विशेषज्ञ दाँतों तले उँगली दबा लेते है। उनकी समझ में यह नहीं आता कि इतनी उच्चस्तरीय तकनीक का प्रयोग तब के जमाने में किस प्रकार बन पड़ा? महर्षि वाल्मीकि ने मय के इसी ज्ञान, कला और कौशल से अभिभूत होकर रामायण के करीब पचास अध्यायों में उनके निर्माणों और शिल्पदक्षता का चित्ताकर्षक वर्ण किया है। तुलसीदास ने तो उससे और आगे बढ़कर शब्द अभाव की बात कहते हुए अपनी असमर्थता प्रकट कर दी। “ अरनि ने जाइ बनाव”
मैक्सिको स्थित मय की भूल नगर आर्ष साहित्य में भागवती पूरी के नाम से विख्यात है। इसकी रचना स्वयं मय ने की थी।। कथा सरित्सागर में भी भागवती पूरी के उत्कर्ष, समृद्धि और सुन्दरता का अद्भुत वर्णन है। ऐसा उल्लेख मिलता है कि वहाँ के बाद मय आर्यावर्त में हिमालय की तराई में आकर बस गए। वहाँ उनने अपनी पत्नी हेमा के नाम विलक्षण हेमपुर नगरी बनायी और बसायी। हेमा की एक अत्यंत अंतरंग सखी स्पयंप्रभा नामक अप्सरा थी। मय ने उसके लिए किष्किंधा के निकट ऋक्ष्बिल नामक एक तिलस्मी भवन बनाया था ऐसा वर्णन आता है। तमिलनाडु में अब भी वह ऋक्ष्बिल गुफा मौजूद है। कहते है कि सीता खोज के दौरान स्पयंप्री ने इसी कंदरा के भूमिगत शार्टकट मार्ग से हनुमान और उनके सहयोगियों को लंका के समुद्र तट तक पहुँचाया था।
जल, विद्युत प्रकाश, वायु परमाणु शक्ति जैसी ऊर्जाओं उपयोग मय-विद्या की प्रमुख विशेषता थी। उन्होंने ही सर्वप्रथम ऊर्जा के पदार्थ में रूपांतरण का अपना मय सिद्धान्त प्रस्तुत किया। वे सूर्य सिद्धान्त के प्रणेता माने जाते है।
अब से डेढ़ हजार वर्ष पूर्व मध्य अमेरिकी देश मैक्सिको में मय सभ्यता अपने पूर्ण उत्कर्ष पर थी। यह सभ्यता भी कहते हैं। यह मय सभ्यता की ही एक शाखा थी। इनके निर्माणों में सौ-सौ टन के ग्रेनाइट शिलाखंड प्रयुक्त हुए है, जो आश्चर्यजनक है। दो शिलाखण्डों के मध्य की संधियों में किसी सीमेन्ट जैसी चीज के प्रयोग के कोई प्रमाण नहीं है। यह उनकी परिष्कृत टेक्नोलॉजी की साक्षी है। पहाड़ की तलहटी में मार्गों की विशिष्ट बनावट, खाइयों के ऊपर पुलों के अवशेष, विमानों के उड़ने और उतरने की हवाई पट्टियों यह दर्शाती है कि मय की ज्ञान विज्ञान संबंधी जानकारी अति उच्चस्तरीय थी। यहाँ यह स्पष्ट कर देना अनुपयुक्त न होगा कि काल और संरचना की दृष्टि से भारतीय मय सभ्यता और मैक्सिको मय सभ्यता एकदम अभिन्न थी।, अतः इन्हें दो पृथक् सभ्यता न कहकर एक ही परंपरा का अंग मानना अनुचित न होगा।
आधुनिकतम विज्ञान पुरातन ज्ञान के खंडहर पर खड़ा है। भग्नावशेष से भवन की भव्यता का अनुमान लगाना कठिन नहीं है। यह भी अटकल आसानी से लगायी जा सकती है कि जिस विद्या का प्रशस्ति गान युग गा रहा है, वह कितनी मुश्किलों से प्राप्त की गई होगी और उसके लिए उपदेष्टाओं को कितना दीर्घकालीन तप करना पड़ा होगा तप की पूँजी ही उत्कर्ष का आधार है। आज भी उसके द्वारा हम ज्ञान-विज्ञान के उस शिखर पर पहुँच सकते, जहाँ कभी पूर्व में प्रतिष्ठित थे, यह सुनिश्चित है।
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आध्यात्मिक काम विज्ञान



आस्तिक कौन ? नास्तिक कौन ? आस्तिकता का सच्चा स्वरूप 'ईश्वर है'-केवल इतना मान लेना मात्र ही आस्तिकता नहीं है । ईश्वर की सत्ता में विश्वास कर लेना भी आस्तिकता नहीं है, क्योंकि आस्तिकता विश्वास नहीं, अपितु एक अनुभूति है । 'ईश्वर है' यह बौद्धिक विश्वास है । ईश्वर को अपने हृदय में अनुभव करना, उसकी सत्ता को संपूर्ण सचराचर जगत में ओत- प्रोत देखना और उसकी अनुभूति से रोमांचित हो उठना ही सच्ची आस्तिकता है । आस्तिकता की अनुभूति ईश्वर की समीपता का अनुभव कराती है । आस्तिक व्यक्ति जगत को ईश्वर में और ईश्वर को जगत में ओत-प्रोत देखता है । वह ईश्वर को अपने से और अपने को ईश्वर से भिन्न अनुभव नहीं करता । उसके लिए जड़-चेतनमय सारा संसार ईश्वर रूप ही होता है । वह ईश्वर के अतिरिक्त किसी भिन्न सत्ता अथवा पदार्थ का अस्तित्व ही नहीं मानता । प्राय: जिन लोगों को धर्म करते देखा जाता है उन्हें आस्तिक मान लिया जाता है । यह बात सही है कि आस्तिकता से धर्म-प्रवृत्ति का जागरण होता है । किंतु यह आवश्यक नहीं कि जो धर्म-कर्म करता हो वह आस्तिक भी हो । अनेक लोग प्रदर्शन के लिए भी धर्म-कार्य किया करते हैं । वे ईश्वर के प्रति अपना विश्वास, श्रद्धा तथा भक्ति को व्यक्त करते हैं । किंतु उनकी वह अभिव्यक्ति मिथ्या एवं प्रदर्शनभर ही हुआ करती है- http://literature.awgp.org

शोधकर्ता एक वास्तविक जीवन टर्मिनेटर बनाने के करीब आ सकते हैं

कृत्रिम बुद्धि और मशीन सीखने के भविष्य के बारे में सामूहिक मानवीय कल्पना को परेशान करने का एक व्यापक भय है, लेकिन विज्ञान-कल्पित फिल्मों के इन प्रतीकों को जल्द ही एक वास्तविकता बन सकती है?

डीसीएस निगम और अमेरिकी सेना अनुसंधान प्रयोगशाला के शोधकर्ताओं ने मानव मस्तिष्क के डेटासेट को कृत्रिम बुद्धि तंत्रिका नेटवर्क में डालने के बाद मार्च में साइप्रस में वार्षिक बुद्धिमान उपयोगकर्ता इंटरफ़ेससम्मेलन में एक पत्र प्रस्तुत किया।
इसके बाद, नेटवर्क ने एक लक्ष्य के लिए खोज करते समय एक इंसान को पहचानना सीख लिया। निष्कर्ष एक साल के लंबे शोध कार्यक्रम का परिणाम संज्ञानात्मक और न्यूरोएगोनोमिक्स सहयोगी प्रौद्योगिकी गठबंधन के रूप में किया गया था।
युद्ध में लक्ष्य को एक सैन्य की प्रभावशीलता के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन यह भी कि सेना का देश किस प्रकार दुनिया भर में प्रकट होता है। अमेरिकी सेना के रूप में नागरिक मौत, या "संपार्श्विक क्षति" की जनता, उस देश की अंतरराष्ट्रीय ख्याति पर गंभीरता से नजरअंदाज और नष्ट हो जाती है।
वर्तमान प्रौद्योगिकी मानव आंखों की तुलना में अधिक दूरी में देखने में सक्षम है, और इलेक्ट्रॉनिक सर्किट मानव रिफ्लेक्स और तेज गति से शूट कर सकते हैं, हालांकि ट्रिगर खींच सकते हैं, हालांकि यह जानने के लिए कि क्या चुनने का लक्ष्य अभी भी मनुष्यों का प्रांत हैसंज्ञानात्मक और न्यूरोओगोनोमिक्स सहयोगी प्रौद्योगिकी गठबंधन उस अंतर को कम करने की योजना बना रहा है।
अब तक मशीन सीखना सॉफ्टवेयर के रूप में ढेर सारे संरचित डेटा पर भारी निर्भर है। लेकिन आसानी के साथ एक लक्ष्य की पहचान - अर्नाल्ड श्वार्ज़नेगर आसानी से टर्मिनेटर फिल्मों में करता है - रोबोट और मशीनों के लिए असली दुनिया में अभी भी बहुत मुश्किल है दूसरी ओर मानव स्मृति, इस मान्यता को आंशिक रूप से धन्यवाद में, स्मृति में बनाया गया है।
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अमेरिकी सैनिक जल्द बनेंगे रोबोट, करेंगे जंग की तैयारी

US military is working on a project TNT to build new neural pathways in brain

सभी देशों के लिए चुनौती बना अमेरिका अब एक नए प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। वह अपने सैनिकों को महामानव बनाने की हर कोशिश करने में जुटा है। अमेरिकी रक्षा एजेंसी 'डारपा' सैनिकों के मस्तिष्क को नियंत्रिंत करने पर शोध कर रही है। इस खास तरह के प्रोजेक्ट का नाम है टीएनटी (टार्गेटेड न्यूरोप्लास्टिसिटी ट्रेनिंग)। इसमें सैनिकों के सीखने और समझने की क्षमता बढ़ेगी। 

प्रयोग सफल रहा तो अमेरिकी सैनिक बन जाएंगे जीवित रोबोट


इस प्रक्रिया से सैनिकों के सीखने और समझने में 30 प्रतिशत तेज सुधार देखने को मिलेगा। इस पूरे प्रोजेक्ट को लगभग 4 सालों में पूरा किया जाएगा। इन चार सालों में सैनिकों के मस्तिष्क में सिनैप्टिक प्लास्टिसिटी को तेज करने की गतिविधियों पर भी काम किया जाएगा। 'डारपा' विद्युतीय उत्तेजना के जरिए सैनिकों के मस्तिष्क को तेज करना चाहती है। 

2016 में घोषित हुए टीएनटी कार्यक्रम में डारपा ने अमेरिका के 7 संस्थानों  यूनिवर्सिटी अॉफ टेक्सास, एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी, जॉन हॉपकिस यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी अॉफ फ्लोरिडा,यूनिवर्सिटी अॉफ मैरीलैंड, और राइट स्टेट यूनिवर्सिटी को 8 शोध सौंपे हैं। 
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मंत्र विज्ञान का रहस्य

मन्त्र विज्ञान

मन को मनन करने की शक्ति या एकाग्रता प्राप्त करके जप के द्वारा सभी भयों का नाश करके पूरी तरह रक्षा करने वाले शब्दों को मंत्र कहते है।  अर्थार्थ मनन करने पर जो रक्षा करे उसे मंत्र कहते है।  जो शब्दों का समूह या कोई शब्द विशेष जपने पर मन को एकाग्र करे और प्राण रक्षा के साथ साथ अभीष्ट फल प्रदान करें वे मंत्र होते है।मंत्र शब्द संस्कृत भाषा से है।  संस्कृत के आधार पर मंत्र शब्द का अर्थ सोचनाधारणा करना समझना व् चाहना  होता है।  मन्त्र जप हमारे यहां सर्वसामान्य है।  मन में कहने की प्रणाली दीर्घकाल से चली आ रही है।  केवल हिन्दुओ में ही नहीं वरन बौध्दजैन सिक्ख आदि सभी धर्मों में मंत्र जप किया जाता है।  मुस्लिम भाई भी तस्बियां घुमाते है।सही अर्थ में मंत्र जप का उद्देश्य अपने इष्ट को स्मरण करना है।  श्रीरामचरित्र मानस में नवधा भक्ति का जिकर भी आता है।  इसमें रामजी शबरी को कहते है की 'मंत्र जप मम दृढ विस्वास पंचम भक्ति सो वेद प्रकासा '  अर्थार्थ  मंत्र जप और मुझमे पक्का विश्वास रखो।भगवन श्रीकृष्ण जी ने  गीता के १० वें अध्याय के २५ वें श्लोक में 'जपयज्ञ'को अपनी विभूति बताया है।  जपयज्ञ सब के लिए आसान है।  इसमें कोई ज्यादा खर्च नही कोई कठोर नियम नही। यह जब चाहो तब किया जा सकता है। हमारे शरीर में ७ केंद्र होते है।  उनमे से नीचे के में घृणा ईर्ष्याभयस्पर्धा ,काम आदि होते है।  लेकिन मंत्र जप के प्रभाव से जपने वाले का भय निर्भयता में घृणा प्रेम में  और काम राम में बदल  जाता है। प्रथम केंद्र मूलाधार होता है।
Kendron Par Mantra ka PrabhavMantra Vigyan




दूसरा स्वाधिष्ठान केंद्र होता है इसमें चिंता निश्चिंता में बदलती है।  तीसरा केंद्र मणिपुर  है।  जिससे रोगप्रतिकारक शक्ति बढ़ती है।  क्षमा शक्ति विकसित होती है।  




सात बार ओम या हरिओम मंत्र का गुंजन करने से मूलाधार केंद्र में स्पंदन होता है जिससे रोगो के कीटाणु नष्ट होते है।  क्रोध के हमारी जीवनी शक्ति का नाश होता है।  वैज्ञानिकों का कहना है की यदि एक घंटे तक क्रोध करनेवाले व्यक्ति के श्वासों के कण इकट्ठे करके अगर इंजेक्शन बनाया जाये तो उस इंजेक्शन से २० लोगो को मारा जा सकता है। 




यदि एक घंटे के क्रोध से २० लोगो की मृत्यु हो सकती है  तो एक घंटे के हरिनाम कीर्तन से असंख्यों लोगों को आनंद व् मन की शांति मिलती है।  मंत्र शक्ति में  आश्चर्य नही तो क्या है।

मंत्रशक्ति के द्वारा ये सब संभव है। 
स्रोत : http://bhindobhains.blogspot.in
Mantra2
   मंत्र का अर्थ है, एक शुद्ध ध्वनि। आज आधुनिक विज्ञान ने साबित कर दिया है कि समूचा अस्तित्व ऊर्जा का स्पंदन  है, स्‍पंदन का स्‍तर अलग अलग होता है। जहां भी कोई स्पंदन होता है, वहां ध्वनि होनी ही है।

हर रूप के साथ जुड़ी है ध्वनि

रूप या आकार अलग-अलग तरह के होते हैं और हर रूप के साथ एक ध्वनि जुड़ी होती है और हर ध्वनि के साथ एक रूप जुड़ा होता है। जब आप कोई ध्वनि मुंह से निकालते हैं, तो उसके साथ एक रूप बनता  है। ध्वनियों को एक खास तरह से इस्तेमाल करने का एक पूरा विज्ञान है, जिससे सही तरीके के रूप बनाया जा सके।
मंत्र कोई ऐसी चीज नहीं है, जिसका आप उच्चारण करते हैं, यह वह चीज है जो आप बनना चाहते हैं क्योंकि पूरा अस्तित्व ध्वनियों का एक जटिल संगम है। उसमें से हमने कुछ ध्वनियों को पहचाना जो ब्रह्मांड के हर आयाम को खोलने वाली कुंजियों की तरह हैं।
हम एक खास क्रम में ध्वनि निकालकर शक्तिशाली रूप बना सकते हैं। इसे ‘नाद योग’ कहा जाता है। अगर ध्वनि पर आपका अधिकार है, तो उससे जुड़े रूप पर भी आपका अधिकार होगा।
साउंड्स ऑफ ईशा’ ने मंत्रों पर एक प्रस्तुति तैयार की है जिसका नाम है- ‘वैराग्य’ उन्होंने दस-दस मिनट के पांच मंत्रों को एक साथ पेश किया है। आप कुछ समय तक इन मंत्रों को सुनकर देख सकते हैं कि किस मंत्र को आप अपने सबसे करीब महसूस करते हैं। फिर आप उसका विस्तृत संस्करण प्राप्त कर सकते हैं और उसके साथ समय बिता सकते हैं। फिलहाल आप सिर्फ इन मंत्रों को सुनिए। संगीत की क्‍वालिटी या धुन आदि के आधार पर उन्हें पसंद या नापसंद करने की कोशिश न करें। ये ध्वनियां आपके इतने करीब हो जाएं जितनी आपकी सांस। कुछ समय बाद, बिना उन मंत्रों को सुने भी, उस मंत्र की तरंगे आपके भीतर गुंजित होने लगेंगी। यह आपके लिए अद्भुत रूप से असरकारी हो सकता है।
मंत्र कोई ऐसी चीज नहीं है, जिसका आप उच्चारण करते हैं, यह वह चीज है जो आप बनना चाहते हैं क्योंकि पूरा अस्तित्व ध्वनियों का एक जटिल संगम है। उसमें से हमने कुछ ध्वनियों को पहचाना जो ब्रह्मांड के हर आयाम को खोलने वाली कुंजियों की तरह हैं। जब तक आप खुद चाभी नहीं बन जाते, वह आपके लिए नहीं खुलेगा। मंत्र बनने का मतलब है कि आप चाभी बन रहे हैं, चाभी बन कर ही आप ताले को खोल सकते हैं, वरना कोई और उसे आपके लिए खोलेगा और आपको उसकी सुननी पड़ेगी। देखिए आपको मुझे झेलना पड़ रहा है क्योंकि आपने अभी उसे खोला नहीं है।
बुधवार को हम आपके लिए पेश करेंगे संगीत की बहार, यह एक मौका होगा खुद को खोने का और अपने अंतर से जुड़़ने का
नए आयामों की चाबी हैं मंत्र
Monks chanting duing our Puja ceremony. Photo by Didrik Johnck.
मंत्रों का प्रयोग तो हम सदियों से करते आए हैं, लेकिन बिना जाने बूझे इन मंत्रों का उच्चारण फायदे की जगह नुकसान पहुंचा सकता है। क्या हैं मंत्र, उनके पीछे कौन सा विज्ञान छिपा है, बता रहे हैं सद्‌गुरु…मंत्र का आशय ध्वनि से होता है। आजकल आधुनिक विज्ञान इस पूरी सृष्टि को एक कंपन मानता है। अब जहां कही भी कंपन होगा, वहां ध्वनि तो होगी ही। इसका मतलब है कि यह संपूर्ण सृष्टि एक प्रकार की ध्वनि या कई ध्वनियों का एक जटिल मिश्रण है। यह भी कह सकते हैं कि संपूर्ण सृष्टि विभिन्न प्रकार के मंत्रों का मेल है। इन में से कुछ मंत्रों या ध्वनियों की पहचान हो चुकी है, जो अपने आप में चाभी की तरह हैं। अगर हम उनका एक खास तरह से इस्तेमाल करें तो वे जीवन के अलग आयाम को खोलने में सक्षम हैं, जिनका अनुभव हम अपने भीतर कर सकते हैं।
मंत्र कई तरह के होते है। हर मंत्र शरीर के किसी निश्चित हिस्से में एक खास तरह की उर्जा जागृत करता है। बिना जागरुकता के किसी आवाज को केवल बार-बार दुहराने से दिमाग में सुस्ती छा जाती है। किसी भी ध्वनि के लगातार उच्चारण से मन सुस्त हो जाता है। जब आप पूरी जागरुकता के साथ उसकी सही समझ के साथ मंत्रोच्चारण करते हैं तो वह एक शक्तिशाली साधन बन सकता है। एक विज्ञान के रूप में, यह एक शक्तिशाली आयाम है। लेकिन आज जिस तरह से बिना किसी आधार या बिना आवश्यक तैयारी के लोगों को मंत्र दिए जा रहे हैं इससे बहुत नुकसान हो सकता है।
कुछ मंत्रों या ध्वनियों की पहचान हो चुकी है, जो अपने आप में चाभी की तरह हैं। अगर हम उनका एक खास तरह से इस्तेमाल करें तो वे जीवन के अलग आयाम को खोलने में सक्षम हैं, जिनका अनुभव हम अपने भीतर कर सकते हैं।
हर मंत्र शरीर के अलग-अलग हिस्से में एक खास तरह की उर्जा पैदा करता है। मंत्रों का आधार हमेशा से संस्कृत भाषा रही है। संस्कृत भाषा ध्वनि की दृष्टि से बेहद संवेदनशील है। लेकिन जब अलग-अलग लोग इसे बोलते हैं तो हर व्यक्ति अपने एक अलग अंदाज में बोलता है। अगर एक बंगाली कोई मंत्र बोल रहा है तो वह अपने अंदाज में बोलेगा। इसी तरह एक तमिल भाषी उसी चीज को दूसरे ढंग से कहेगा। अगर कोई अमेरिकी इनका उच्चारण करेगा तो वह बिल्कुल ही अलग होगा। इन मंत्रों के सटीक उच्चारण की अगर सही ट्रेनिंग न दी जाए तो अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले लोग, जब अपने अंदाज में मंत्रों को बोलेंगे तो उच्चारण के बिगडऩे का खतरा रहता है। हालांकि इस तरह की ट्रेनिंग बेहद थका देने वाली होती है। इसे सीखने के लिए जिस धैर्य, लगन और जितने समय की जरूरत होती है, वह आजकल लोगों के पास है ही नही। इसके लिए जबरदस्त लगन और काफी वक्त की जरूरत होती है।
दरअसल, अध्यात्म की दिशा में मंत्र एक बहुत अच्छी शुरुआत हो सकते है। सिर्फ एक मंत्र ही लोगों के जीवन में बहुत कुछ कर सकता है। मंत्र किसी चीज की रचना के लिए एक प्रभावशाली शक्ति बन सकते हैं, लेकिन ऐसा तभी हो सकता है कि जब वे ऐसे स्रोत से आएं, जहाँ यह समझ हो कि ध्वनि ही सबकुछ है। जब हम कहते हैं कि ‘ध्वनि ही सबकुछ है’ तो हमारा मतलब इस सृष्टि से होता है। अगर मंत्र वैसे स्रोत और समझ के उस स्तर से आएं तथा उनका संचारण अगर पूरी तरह शुद्ध हो तो मंत्र एक प्रभावशाली शञ्चित बन सकते हैं।
साभार :http://isha.sadhguru.org


टेलीपैथी और सम्मोहन का वैज्ञानिक दृष्टिकोण

टेलीपैथी के लिए चित्र परिणाम    

टैलीपैथी  क्या  है हमारे  पुराणों  में वर्णित  है की देवता लोग  आपस  में बातचीत  बिना कुछ  कहे  कर लेते थे |  और  वो  सोचते थे  तो  दूसरे  लोगो  के पास  सन्देश  पहुंच  जाता था ,धर्म और विज्ञान ने दुनिया के कई तरह के रहस्यों से पर्दा उठाया है। विज्ञान और टेक्नोलॉजी के इस युग में अब सब कुछ संभव होने लगा है। मानव का ज्ञान पहले की अपेक्षा बढ़ा है। लेकिन इस ज्ञान के बावजूद व्यक्ति की सोच अभी भी मध्ययुगीन ही है। वह इतना ज्ञान होने के बावजूद भी मूर्ख, क्रूर, हिंसक और मूढ़ बना हुआ है।
खैर, आज हम विज्ञान की मदद से हजारों किलोमीटर दूर बैठे किसी व्यक्ति से मोबाइल, इंटरनेट या वीडियो कालिंग के माध्यम से संपर्क कर सकते हैं, लेकिन प्राचीन काल में ऐसा संभव नहीं था तो वे कैसे एक दूसरे से संपर्क पर पाते थे? मान लीजिये आप समुद्र, जंगल या रेगिस्तान में भटक गए हैं और आपके पास सेटेलाइट फोन है भी तो उसकी बैटरी डिस्चार्च हो गई है ऐसे में आप कैसे लोगों से संपर्क कर सकते हैं?
दरअसल, बगैर किसी उपकरण की मदद से लोगों से संपर्क करने की कला को ही टेलीपैथी कहते हैं। जरूरी नहीं कि हम किसी से संपर्क करें। हम दूरस्थ बैठे किसी भी व्यक्ति की वार्ता को सुन सकते हैं, देख सकते हैं और उसकी स्थिति को जान सकते हैं। इसीलिये टेलीपैथी को हिन्दी में दूरानुभूति कहते हैं। टेलीपैथी शब्द का सबसे पहले इस्तेमाल 1882 में फैड्रिक डब्लू एच मायर्स ने किया था। कहते हैं कि जिस व्यक्ति में यह छठी ज्ञानेंद्रिय होती है वह जान लेता है कि दूसरों के मन में क्या चल रहा है। यह परामनोविज्ञान का विषय है जिसमें टेलीपैथी के कई प्रकार बताए जाते हैं।
'टेली' शब्द से ही टेलीफोन, टेलीविजन आदि शब्द बने हैं। ये सभी दूर के संदेश और चित्र को पकड़ने वाले यंत्र हैं। आदमी के मस्तिष्क में भी इस तरह की क्षमता होती है। कोई व्यक्ति जब किसी के मन की बात जान ले या दूर घट रही घटना को पकड़कर उसका वर्णन कर दे तो उसे पारेंद्रिय ज्ञान से संपन्न व्यक्ति कहा जाता है। महाभारतकाल में संजय के पास यह क्षमता थी। उन्होंने दूर चल रहे युद्ध का वर्णन धृतराष्ट्र को कह सुनाया था।
भविष्य का आभास कर लेना भी टेलीपैथिक विद्या के अंतर्गत ही आता है। किसी को देखकर उसके मन की बात भांप लेने की शक्ति हासिल करना तो बहुत ही आसान है। चित्त को स्थित कर ध्यान से देखने और सुनने की क्षमता बढ़ाएंगे तो सामने वाले के मन की आवाज भी सुनाई देगी। इसके लिए नियमित अभ्यास की आवश्यकता है।
दरअसल टेलीपैथी दो व्यक्तियों के बीच विचारों और भावनाओं के आदान-प्रदान को भी कहते हैं। इस विद्या में हमारी पांच ज्ञानेंद्रियों का इस्तेमाल नहीं होता, यानी इसमें देखने, सुनने, सूंघने, छूने और चखने की शक्ति का इस्तेमाल नहीं किया जाता। यह हमारे मन और मस्तिष्क की शक्ति होती है। 

टेलीपैथी सिखने के सामान्यत: तीन तरीके हैं:
पहला : ध्यान द्वारा
दूसरा : योग द्वारा
तीसरा : आधुनिक तकनीक
ध्यान द्वारा : लगातार ध्यान करते रहने से चित्त स्थिर होने लगता है। चित्त के स्थिर और शांति होने से साक्षीभाव घटित होता है। यह संवेदनशिल अवस्था टेलीपैथी के लिये जरूरी होती है। ध्यानसंपन्न व्यक्ति किसी के भी मन की बात समझ सकता है। कितने ही दूर बैठे व्यक्ति की स्थिति और वार्तालाप का वर्णन कर सकता है।
योग द्वारा : योग में मन: शक्ति योग के द्वारा इस शक्ति हो हासिल किया जा सकता है। ज्ञान की स्थिति में संयम होने पर दूसरे के चित्त का ज्ञान होता है। यदि चित्त शांत है तो दूसरे के मन का हाल जानने की शक्ति हासिल हो जाएगी। योग में त्राटक विद्या, प्राण विद्या के माध्यम से भी आप यह विद्या सिख सकते हैं।
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टेलीपैथी का आधुनिक तरीका : तरीके भले ही आधुनिक हो लेकिन इसके सर्वप्रथम आपको ध्यान का अभ्यास तो करना ही होगा तभी यह तरीका कारगर सिद्ध होगा। टेलीपैथी उस प्रक्रिया को कहा जाता है जिसके जरिए बिना किसी भौतिक माध्यम की सहायता के एक इंसान दूसरे व्यक्ति के मस्तिष्क को पढ़ने अथवा उसे अपने विचारों से अवगत कराने में कामयाब होता है।
आधुनिक तरीके के अनुसार ध्यान से देखने और सुनने की क्षमता बढ़ाएंगे तो सामने वाले के मन की आवाज भी सुनाई देगी। इसके लिए नियमित अभ्यास की आवश्यकता है। इस विद्या में सम्मोहन का भी सहरा लिया जाता है। सम्मोहन के माध्यम से हम अपने चेतन मन को सुलाकर अवचेतन मन को जाग्रत करते हैं और फिर इस अवचेतन मन के माध्यम से हम दूसरे व्यक्ति के मन बात, विचार आदि पढ़ लेते हैं और यदि वह हजारों किलोमीटर भी बैठा है तो इस मन के माध्यम से व्यक्ति को वह उसके सामने ही नजर आता है।
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चेतन मन और अचेतन मन : हमारे मन की मुख्यतः दो अवस्थाएं (कई स्तर) होती हैं-
चेतन मन और 2. अवचेतन मन (आदिम आत्मचेतन मन): सम्मोहन के दौरान अवचेतन मन को जाग्रत किया जाता है। ऐसी अवस्था में व्यक्ति की शक्ति बढ़ जाती है लेकिन उसका उसे आभास नहीं होता, क्योंकि उस वक्त वह सम्मोहनकर्ता के निर्देशों का ही पालन कर रहा होता है।
1. चेतन मन : इसे जाग्रत मन भी मान सकते हैं। चेतन मन में रहकर ही हम दैनिक कार्यों को निपटाते हैं अर्थात खुली आंखों से हम कार्य करते हैं। विज्ञान के अनुसार मस्तिष्क का वह भाग जिसमें होने वाली क्रियाओं की जानकारी हमें होती है। यह वस्तुनिष्ठ एवं तर्क पर आधारित होता है।
2. अवचेतन मन : जो मन सपने देख रहा है वह अवचेतन मन है। इसे अर्धचेतन मन भी कहते हैं। गहरी सुसुप्ति अवस्था में भी यह मन जाग्रत रहता है। विज्ञान के अनुसार जाग्रत मस्तिष्क के परे मस्तिष्क का हिस्सा अवचेतन मन होता है। हमें इसकी जानकारी नहीं होती।
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अवचेतन मन की शक्ति : हमारा अवचेतन मन चेतन मन की अपेक्षा अधिक याद रखता है एवं सुझावों को ग्रहण करता है। आदिम आत्मचेतन मन न तो विचार करता है और न ही निर्णय लेता है। उक्त मन का संबंध हमारे सूक्ष्म शरीर से होता है।
यह मन हमें आने वाले खतरे या उक्त खतरों से बचने के तरीके बताता है। इसे आप छठी इंद्री भी कह सकते हैं। यह मन लगातार हमारी रक्षा करता रहता है। हमें होने वाली बीमारी की यह मन 6 माह पूर्व ही सूचना दे देता है और यदि हम बीमार हैं तो यह हमें स्वस्थ रखने का प्रयास भी करता है। बौद्धिकता और अहंकार के चलते हम उक्त मन की सुनी-अनसुनी कर देते हैं। उक्त मन को साधना ही सम्मोहन है।
अवचेतन को साधने का असर : सम्मोहन द्वारा मन की एकाग्रता, वाणी का प्रभाव व दृष्टि मात्र से उपासक अपने संकल्प को पूर्ण कर लेता है। इससे विचारों का संप्रेषण (टेलीपैथिक), दूसरे के मनोभावों को ज्ञात करना, अदृश्य वस्तु या आत्मा को देखना और दूरस्थ दृश्यों को जाना जा सकता है। इसके सधने से व्यक्ति को बीमारी या रोग के होने का पूर्वाभास हो जाता है।
कैसे साधें इस अवचेतन मन को, जानिये तरीका...
कैसे साधें इस मन को :
पहला तरीका : वैसे इस मन को साधने के बहुत से तरीके या विधियां हैं, लेकिन सीधा रास्ता है कि प्राणायाम से सीधे प्रत्याहार और प्रत्याहार से धारणा को साधें। जब आपका मन स्थिर चित्त हो, एक ही दिशा में गमन करे और इसका अभ्यास गहराने लगे तब आप अपनी इंद्रियों में ऐसी शक्ति का अनुभव करने लगेंगे जिसको आम इंसान अनुभव नहीं कर सकता। इसको साधने के लिए त्राटक भी कर सकते हैं। त्राटक भी कई प्रकार से किया जाता है। ध्यान, प्राणायाम और नेत्र त्राटक द्वारा आत्म सम्मोहन की शक्ति को जगाया जा सकता है।
दूसरा तरीका : शवासन में लेट जाएं और आंखें बंद कर ध्यान करें। लगातार इसका अभ्यास करें और योग निद्रा में जाने का प्रयास करें। योग निद्रा अर्थात शरीर और चेतन मन इस अवस्था में सो जाता है लेकिन अवचेतन मन जाग्रत रहता है। समझाने के लिए कहना होगा कि शरीर और मन सो जाता है लेकिन आप जागे रहते हैं। यह जाग्रत अवस्था जब गहराने लगती है तो आप ईथर माध्‍यम से जुड़ जाते हैं और फिर खुद को निर्देश देकर कुछ भी करने की क्षमता रखते हैं।
तीसरा तरीका : कुछ लोग अंगूठे को आंखों की सीध में रखकर, तो कुछ लोग स्पाइरल (सम्मोहन चक्र), कुछ लोग घड़ी के पेंडुलम को हिलाते हुए, कुछ लोग लाल बल्ब को एकटक देखते हुए और कुछ लोग मोमबत्ती को एकटक देखते हुए भी उक्त साधना को करते हैं, लेकिन यह कितना सही है यह हम नहीं जानते।
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चौथा तरीका कल्पना : कल्पना करें कि आप कोई बात किसी व्यक्ति को कहने के लिए सोचें और उस तक वह बात पहुंच जाए। बार बार कल्पना करें और अपनी बात को दोहराएं। दोहराने का यह अभ्यास जब गहराएगा तो उस व्यक्ति तक आपके मस्तिष्क की तरंगे पहुंचने लगेगी। यदि आप उसे यहां बुलाना चाहते हैं तो कल्पना में उसका चित्र देखकर उसके बुलाने का संदेश भेजें। धीरे धीरे जब यह प्रयोग कामयाब होने लगेगा तो आपका विश्वास भी बढ़ता जाएगा।
इसी तरह आप किसी भी व्यक्ति के होने की स्थिति की पहले कल्पना करते हैं जब वह कल्पना प्रगाड़ होने लगती है तब सही सूचना देने लगती है। कुछ भी बोलने से पहले दिमाग में कुछ तरंगें बनती हैं। जापानी वैज्ञानिकों का कहना है कि उन्होंने इसे डीकोड करना जान लिया है और उनके परिणाम 90 प्रतिशत तक सफल हैं। वैसे, उनका यह प्रयोग सिर्फ जापानी भाषा तक ही सीमित है। लेकिन आश्चर्य नहीं कि इस टेक्नोलॉजी का उपयोग दूसरी भाषाओं में भी संभव होगा।
ब्रेन कंप्यूटर विशेषज्ञ प्रो. यामाजाकी तोषिमासा के नेतृत्व में एक टीम ने इलेक्ट्रॉनिक्स, सूचना और संचार इंजीनियर इंस्टीट्यूट द्वारा आयोजित वर्कशॉप में इसका लाइव प्रदर्शन भी किया। उन्होंने साबित किया कि बोले जाने से दो सेकेंड पहले उनकी मशीन उस बात को समझ लेती है जो बोली जाने वाली है। यह टीम दिमाग के एक खास हिस्से की गतिविधियों पर काम कर रही है जिसे चिकित्सा विज्ञान की भाषा में ब्रोका कहते हैं। यह हिस्सा भाषा प्रक्रिया और बोलने से संबंधित है।
विचारों से बनता भविष्य : भगवान बुद्ध कहते हैं कि आज आप जो भी हैं, वह आपके पिछले विचारों का परिणाम है। विचार ही वस्तु बन जाते हैं। इसका सीधा-सा मतलब यह है कि हम जैसा सोचते हैं, वैसा ही भविष्य का निर्माण करते हैं। यही बात 'दि सीक्रेट' में भी कही गई है और यही बात धम्मपद, गीता, जिनसूत्र और योगसूत्र में कही गई है। इसे आज का विज्ञान आकर्षण का नियम कहता है।
संसार को हम पांचों इंद्रियों से ही जानते हैं और कोई दूसरा रास्ता नहीं। जो भी ग्रहण किया गया है, उसका मन और मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है। उस प्रभाव से ही 'चित्त' निर्मित होता है और निरंतर परिवर्तित होने वाला होता है। इस चित्त को समझने से ही आपके जीवन का खेल आपको समझ में आने लगेगा। अधिकतर लोग अब इसे समझकर अच्‍छे स्थान, माहौल और लोगों के बीच रहने लगे हैं। वे अपनी सोच को बदलने के लिए ध्यान या पॉजिटिव मोटिवेशन की क्लासेस भी जाने लगे हैं।
वैज्ञानिक कहते हैं कि मानव मस्तिष्क में 24 घंटे में लगभग 60 हजार विचार आते हैं। उनमें से ज्यादातर नकारात्मक होते हैं। नकारात्मक विचारों का पलड़ा भारी है तो फिर भविष्य भी वैसा ही होगा और यदि मिश्रित विचार हैं तो मिश्रित भविष्य होगा। अधिकतर लोग नकारात्मक फिल्में, सीरियल और गाने देखते रहते हैं इससे उनका मन और मस्तिष्क वैसा ही निर्मित हो जाता है। वे गंदे या जासूसी उपन्यास पढ़कर भी वैसा ही सोचने लगते हैं। आजकल तो इंटरनेट हैं, जहां हर तरह की नकारात्मक चीजें ढूंढी जा सकती हैं। न्यूज चैनल दिनभर नकारात्मक खबरें ही दिखाते रहते हैं जिन्हें देखकर सामूहिक रूप से समाज का मन और मस्तिष्क खराब होता रहता है।
जैसी मति वैसी गति : 3 अवस्थाएं हैं- जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति। उक्त 3 तरह की अवस्थाओं के अलावा हमने और किसी प्रकार की अवस्था को नहीं जाना है। जगत 3 स्तरों वाला है- एक स्थूल जगत जिसकी अनुभूति जाग्रत अवस्था में होती है। दूसरा, सूक्ष्म जगत जिसका स्वप्न में अनुभव करते हैं तथा तीसरा, कारण जगत जिसकी अनुभूति सुषुप्ति में होती है।
उक्त तीनों अवस्थाओं में विचार और भाव निरंतर चलते रहते हैं। जो विचार धीरे-धीरे जाने-अनजाने दृढ़ होने लगते हैं वे धारणा का रूप धर लेते हैं। चित्त के लिए अभी कोई वैज्ञानिक शब्द नहीं है लेकिन मान लीजिए कि आपका मन ही आपके लिए जिन्न बन जाता है और वह आपके बस में नहीं है, तब आप क्या करेंगे? धारणा बन गए विचार ही आपके स्वप्न का हिस्सा बन जाते हैं। आप जानते ही हैं कि स्वप्न तो स्वप्न ही होते हैं उनका हकीकत से कोई वास्ता नहीं फिर भी आप वहां उस काल्पनिक दुनिया में उपस्थित होते हैं।
इसी तरह बचपन में यदि यह सीखा है कि आत्मा मरने के बाद स्वर्ग या नर्क जाती है और आज भी आप यही मानते हैं तो आप निश्‍चित ही एक काल्पनिक स्वर्ग या नर्क में पहुंच जाएंगे। यदि आपके मन में यह धारणा बैठ गई है कि मरने के बाद व्यक्ति कब्र में ही लेटा रहता है तो आपके साथ वैसा ही होगा। हर धर्म आपको एक अलग धारणा से ग्रसित कर देता है। हालांकि यह तो एक उदाहरण भर है। धर्म आपके चित्त को एक जगह बांधने के लिए निरंतर कुछ पढ़ने या प्रार्थना करने के लिए कहता है।
वैज्ञानिकों ने आपके मस्तिष्क की सोच, कल्पना और आपके स्वप्न पर कई तरह के प्रयोग करके जाना है कि आप हजारों तरह की झूठी धारणाओं, भय, आशंकाओं आदि से ग्रसित रहते हैं, जो कि आपके जीवन के लिए जहर की तरह कार्य करते हैं। वैज्ञानिक कहते हैं कि भय के कारण नकारात्मक विचार बहुत तेजी से मस्तिष्क में घर बना लेते हैं और फिर इनको निकालना बहुत ही मुश्किल होता है 

साभार  डेलीहंट 
सम्मोहन (Hypnosis) वह कला है जिसके द्वारा मनुष्य उस अर्धचेतनावस्था में लाया जा सकता है जो समाधि, या स्वप्नावस्था, से मिलती-जुलती होती है, किंतु सम्मोहित अवस्था में मनुष्य की कुछ या सब इंद्रियाँ उसके वश में रहती हैं। वह बोल, चल और लिख सकता है; हिसाब लगा सकता है तथा जाग्रतावस्था में उसके लिए जो कुछ संभव है, वह सब कुछ कर सकता है, किंतु यह सब कार्य वह सम्मोहनकर्ता के सुझाव पर करता है।कभी कभी यह सम्मोहन बिना किसी सुझाव के भी काम करता है और केवल लिखाई और पढ़ाई में भी काम करता है जैसे के फलाने मर्ज की दवा यहाँ मिलती है इस प्रकार के हिप्नोसिस का प्रयोग भारत में ज्यादा होता है
 विकिपीडिया से
सम्मोहन  विद्या  भारत की  प्राचीनतम  और सर्वश्रेष्ठ  विद्या है  इसे  त्रिकाल विद्या के  नाम से  जाना जाता है | दरअसल यौगिक क्रियाओं का उद्देश्य मन को पूर्ण रूप से एकाग्र करके समाधि में लीन कर देना है और इस लीन करने की शक्ति का जो अंश प्राप्त होता है, उसी को सम्मोहन कहते हैं। सम्मोहन की शक्ति प्राप्त करने के.अनेक तरीके इस्तेमाल किए जाते हैं।  ..

सम्मोहन का अर्थ आमतौर पर वशीकरण से लगाया जाता है। वशीकरण अर्थात किसी को वश में करने की विद्या, ‍ज‍बकि यह सम्मोहन की प्रतिष्ठा को गिराने वाली बात है। मन के कई स्तर होते हैं। उनमें से एक है आदिम आत्म..चेतन मन। आदिम आत्म चेतन मन न तो विचार करता है और न ही निर्णय लेता है। उक्त मन का संबंध हमारे सूक्ष्म शरीर से होता है। यह मन हमें आने वाले खतरे या उक्त खतरों से बचने के तरीके बताता है। इसे आप छटी...यह मन लगातार हमारी रक्षा करता रहता है। हमें होने वाली बीमारी की यह मन छह माह पूर्व ही सूचना दे देता है और यदि हम बीमार हैं तो यह हमें स्वस्थ रखने का प्रयास करता है। बौद्धिकता और अहंकार के चलते हम उक्त..क्या होगा इस मन को साधने से :
यह मन आपकी हर तरह की मदद करने के लिए तैयार है, बशर्ते आप इसके प्रति समर्पित हों। यह किसी के भी अतीत और भविष्य को जानने की क्षमता रखता है। आपके साथ घटने वाली घटनाओं  को टालने के उपाय खोज लेंगे। आप स्वयं की ही नहीं दूसरों की बीमारी दूर करने की क्षमता भी हासिल कर सकते हैं।  सम्मोहन द्वारा मन की एकाग्रता, वाणी का प्रभाव व दृष्टि मात्र से उपासक अपने संकल्प को पूर्ण कर लेता है। इससे विचारों का संप्रेषण (टेलीपैथिक), दूसरे के मनोभावों को ज्ञात करना, अदृश्य वस्तु या आत्मा को.कैसे साधें इस मन को :
प्राणायम से साधे प्रत्याहार को और प्रत्याहार से धारणा को। जब आपका मन स्थिर चित्त हो, एक ही दिशा में गमन करे और इसका अभ्यास गहराने लगे तब आप अपनी इंद्रियों में ऐसी शक्ति का अनुभव... ध्यान, प्राणायाम और नेत्र त्राटक द्वारा सम्मोहन की शक्ति को जगाया जा सकता है। त्राटक उपासना को हठयोग में दिव्य साधना से संबोधित किया गया है। आप उक्त साधना के बारे में जानकारी प्राप्त कर किसी योग्य.. नियमित सूर्य नमस्कार, प्राणायाम और योगनिंद्रा करते हुए ध्यान करें। ध्यान में विपश्यना और नादब्रह्म का उपयोग करें। प्रत्याहार का पालन करते हुए धारणा को साधने का प्रयास करें। संकल्प के प्रबल होने से..धारणा को साधने में आसानी होगी है। संकल्प सधता है अभ्यास के महत्व को समझने से। इसके संबंध में ज्यादा जानकारी के लिए मिलें किसी योग्य योग शिक्षक या सम्मोहनविद से।  
स्रोत.webdunia.com

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