Vigyan India.com (विज्ञान इंडिया डाट कॉम ): क्लिनिकली डेड इंसान को भी रहता है होश

क्लिनिकली डेड इंसान को भी रहता है होश


मेडिकल लिहाज से डेड करार दिए जा चुके इंसान को भी होश रह सकता है...


लंदन

किसी का दिल और दिमाग काम करना बंद कर दे तो उसे मरा हुआ ही समझा जाएगा ना, पर क्या कोई यह उम्मीद भी कर सकता है कि वह इंसान अपने आसपास की हलचल महसूस कर रहा होगा। यकीन करना मुश्किल है मगर साइंटिस्ट्स ने 2000 लोगों पर स्टडी के बाद यही पता लगाया है। डॉक्टरों के मुताबिक, मेडिकल लिहाज से डेड करार दिए जा चुके इंसान को भी होश रह सकता है।

साउथैंप्टन यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने मौत के बाद कैसा लगता है इस बात को जानने के लिए यूके, यूएस और ऑस्ट्रिया के 15 अस्पतालों से मरीजों को चुना। ये वो लोग थे जिन्हें दिल का दौरा पड़ा था। साइंटिस्ट्स ने चार साल तक तहकीकात की और पाया कि इनमें से करीब 40 पर्सेंट लोगों को उस वक्त भी होश था, जबकि क्लिनिकल तौर पर वह डेड करार दिए जा चुके थे।

हालांकि बाद में उनके दिल ने दोबारा काम करना शुरू कर दिया। रिसर्चरों के मुताबिक, इनमें से एक शख्स को तो यहां तक याद है कि वह अपने शरीर से किस तरह बाहर आया और कमरे के एक कोने से अपने शरीर के साथ सबकुछ होता हुआ देख रहा था।

'द टेलिग्राफ' के मुताबिक, साउथैंप्टन के 57 साल के एक सोशल वर्कर का कहना था कि बेहोशी और तीन मिनट तक डेड पड़े रहने के बाद भी मुझे अच्छी तरह याद है कि नर्सिंग स्टाफ मेरे आसपास क्या-क्या कर रहा था। इस शख्स को मशीनों की आवाज तक याद थी।

स्टडी को लीड करने वाले यूनिवर्सिटी के ही एक पूर्व रिसर्च फेलो डॉ. सैम पर्निया के मुताबिक दिल एक बार धड़कना बंद कर दे तो दिमाग काम करना बंद कर देता है। पर इस शख्स के मामले में देखा गया कि दिल का धड़कना बंद होने के 3 मिनट बाद तक व्यक्ति को होश था जबकि होता यह है कि धड़कन बंद होने के 20 से 30 सेकेंड बाद ही दिमाग आमतौर पर काम करना बंद कर देता है।

कमाल की बात तो यह है कि उस शख्स ने अपने आसपास हो रही हलचल के बारे में जो-जो भी बताया वो सब सही निकला। यहां तक कि पास रखी मशीन हर तीन मिनट पर एक आवाज निकालती थी और उस मरीज ने उस मशीन से दो आवाजें सुनी थीं। इस तरह अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस शख्स को कितनी देर तक होश रहा होगा। पर्निया के मुताबिक, उस शख्स की बात पर भरोसा करना ही होगा क्योंकि जो भी उसने बताया वह असल में उसके इर्द-गिर्द हो रहा था।

गौरतलब है कि इस स्टडी के लिए जिन 2060 मरीजों को चुना गया था उनमें से 330 लोग बच गए थे और 140 का कहना था कि उन्हें धड़कन वापस आने तक किसी न किसी तरह के एक्सपीरियंस हुए थे। पांच में से एक का कहना था कि उन चंद मिनटों में एक अजीब सी शांति का अहसास हुआ था। वहीं एक तिहाई का कहना था कि वे धीमे पड़ गए थे या उनकी स्पीड तेज हो गई थी।

कुछ ने कहा कि हमने चमकीली रोशनी देखी, किसी ने तेज सुनहरी रोशनी या चमकता सूरज देखा। वहीं कुछ को डर या डूबने का अहसास हुआ था। डॉ. पर्निया मानते हैं कि कई और लोगों को भी मौत के करीब पहुंचने पर ऐसे अनुभव हुए होंगे मगर दवाओं या बेहोशी की दवाओं के कारण शायद वे याद न रख पाएं हों। यह स्टडी जर्नल रिससिटेशन में छपी है।

मौत के करीब होने का अहसास करने वाले कई लोग दुनिया में हैं। गैलप के एक पोल के मुताबिक अमेरिका में आबादी का 3 पर्सेंट हिस्सा मानता है कि उसने ऐसा अहसास किया है। वैसे हर ऐसा अनुभव सच होगा ही ऐसी भी कोई गारंटी नहीं। 58 पेशंट्स पर की गई एक स्टडी से पता लगा था कि 30 मरीज तो मौत के करीब पहुंचे भी नहीं थे जबकि उन्हें लगा था कि वे मौत के करीब थे। हाल की कई स्टडी इस तरह के अनुभवों का तरह-तरह से आकलन करती रही हैं।

काश... मैं कभी न जागूं!

टेक्सस के रहने वाले 18 साल के बेन ब्रीडलव को दिल की बीमारी है। यूट्यूब में उन्होंने मौत के करीब पहुंचने के अहसास को बयां किया है। ऐसे ही एक वाकये के बारे में उन्होंने बताया कि जब मैं बेहोश था, मैंने खुद को एक सफेद कमरे में पाया, जिसकी दीवारें नहीं थीं। वहां कोई शोर नहीं था और उसी शांति का अहसास हो रहा था जो चार साल की उम्र में भी मुझे हुई थी। मैंने एक सुंदर सूट पहना था। मैंने आइने में खुद को देखा और गर्व महसूस किया। मैं वहां से जाना नहीं चाहता था। मैं नहीं चाहता था कि फिर कभी जागूं।
sabhar :http://navbharattimes.indiatimes.com/

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