Vigyan India.com (विज्ञान इंडिया डाट कॉम ): कृत्रिम हाथ असली हाथ जैसा

कृत्रिम हाथ असली हाथ जैसा





 रोम. किसी दुर्घटना में अपना हाथ गंवा चुके लोगों के लिए वैज्ञानिक एक खुशखबरी लाए हैं. शोधकर्ताओं ने एक ऐसा कृत्रिम हाथ बनाने में कामयाबी हासिल करली हैं जो काफी कुछ असली हाथ जैसा हैं. यानि यह कृत्रिम हाथ चीज़ों को पकड़ने के साथ-साथ उन्हें महसूस भी कर सकेगा. यूरोपीय शोधकर्ताओं ने अपनी इस सफलता की घोषणा करते हुए कहा है कि पहली बार एक बायोनिक हाथ के जरिए एक व्यक्ति मुट्ठी में पकड़ी गई चीज की बनावट और आकार समझने में कामयाब रहा है. यानी कृत्रिम हाथ भी अब महसूस करने में मदद कर सकेगा. इटली में बायोनिक हाथ पर एक महीने तक ट्रायल चला. इस कामयाबी ने शोधकर्ताओं में नया जोश भर दिया है.
अब तक कृत्रिम हाथ का इस्तेमाल करने वाले को वस्तु के पकड़े जाने का कोई एहसास नहीं होता था. साथ ही कृत्रिम हाथ को नियंत्रित करना मुश्किल होता है, मतलब यह कि कृत्रिम हाथ का इस्तेमाल करने वाला वस्तु को पकड़ने की कोशिश में उसे नुकसान पहुंचा सकता है.
शोध में शामिल सिलवेस्ट्रो मिचेरा के मुताबिक, जब हमने ये कृत्रिम हाथ सेंसर की मदद से उस व्यक्ति के हाथ पर लगाया तो हम उस हाथ में अहसास उसी समय बहाल कर सके और वह अपने बायोनिक हाथ को नियंत्रित भी कर पा रहा था. इस शोध का नेतृत्व मिचेरा और स्टानिसा रास्पोविच ने किया है.
डेनमार्क के 36 वर्षीय डेनिस आबो सोरेंसन पर इसका ट्रायल किया गया, सोरेंसन पटाखे से जुड़ी एक दुर्घटना में अपना बायां हाथ खो चुके हैं. सोरेंसन के मुताबिक, जब मैंने वस्तु पकड़ी, मैं यह महसूस कर सकता था कि वह मुलायम है या कठोर, गोल है या चौकोर. पिछले 9 सालों में जिन चीजों को मैं महसूस नहीं कर पाया था उसे अब मैंने महसूस किया.
सोरेंसन की बाजू पर भारी मैकेनिकल हाथ लगाया गया है, जिसकी उंगलियों में बहुत सारे एडवांस सेंसर लगे हुए हैं. हाथ के ऊपरी हिस्से में सर्जरी के जरिए कई तार लगाए गए हैं जो सेंसर के जरिए वहां तक सिगनल पहुंचाते हैं. पिछले एक दशक में सोरेंसन की नसों का इस्तेमाल नहीं हुआ था इसके बावजूद वैज्ञानिक सोरेंसन के छूने की भावना को दोबारा सक्रिय करने में कामयाब रहे.
रोम के जमेली अस्पताल में पिछले साल इसका ट्रायल किया गया. इस दौरान सोरेंसन की आंखों में पट्टी बांधी गई और कानों में इयरप्लग्स लगाए गए. ट्रायल के दौरान सोरेंसन नारंगी और बेसबॉल के बीच फर्क बता पाए. वह यह भी बताने के लायक थे कि वह मुलायम चीज पकड़े हुए हैं या कोई कठोर वस्तु या फिर प्लास्टिक की कोई चीज.
सोरेंसन मजाक करते हैं कि जब उनके बच्चों ने उन्हें बहुत सारे वायरों के साथ देखा तो उन्हें द केबल गाय कहकर बुलाने लगे. सुरक्षा कारणों की वजह से सोरेंसन में किया गया प्रत्यारोपण 30 दिन के बाद हटा लिया गया. लेकिन जानकारों का मानना है कि इलेक्ट्रोड्स बिना किसी परेशानी के कई साल शरीर में रह सकते हैं. इस मामले में और अधिक परीक्षण चल रहे हैं. शोधकर्ता कृत्रिम हाथ की संवेदी क्षमताओं को बढ़ाने और उसे पोर्टेबल बनाने के लिए काम कर रहे हैं.
इस बीच सोरेंसन अपना पुराना कृत्रिम हाथ का इस्तेमाल करने लगे हैं. बांह की मांसपेशियों को खींचने या फिर छोड़ने पर कृत्रिम हाथ हरकत करता है लेकिन वह चीजों को महसूस करने की इजाजत नहीं देता. शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि बायोनिक हाथ पर और शोध करने से लाभकारी परिणाम मिल सकते हैं और कृत्रिम हाथ इस्तेमाल करने के लिए मजबूर लोगों के लिए नई उम्मीद जगेगी./
यह पहली बार हुआ है जब किसी विकलांग को नकली हाथ में संवेदना का एहसास हुआ है"
प्रोफ़ेसर सिल्वेस्त्रो मिकेरा
इटली में डेनमार्क के एक व्यक्ति को सर्जरी के बाद ऐसा हाथ लगाया गया है जो उसकी बाजू के ऊपरी हिस्से की नसों से जुड़ा है.
प्रयोगशाला में हुए परीक्षण में उन्हें आंख पर पट्टी बांधकर चीजें थमाई गईं और इस हाथ की मदद से वह इन चीजों के आकार और कड़ेपन को जानने में सफल रहे.डेनिस आबो ने एक दशक पहले आतिशबाज़ी में अपना हाथ गंवा दिया था. उन्होंने इस बायोनिक हाथ को 'अद्भुत' बताया है.
इस बारे में साइंस ट्रांसलेशनल मेडिसिन ने विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की है.
एक अंतरराष्ट्रीय दल ने इस शोध परियोजना में हिस्सा लिया था, जिसमें इटली, स्विटरज़रलैंड और जर्मनी के रोबोटिक्स विशेषज्ञ शामिल थे.

परियोजना

"इकोल पॉलीटेक्नीक फ़ेडेरेल डी लुसाने और स्कूओला सुपीरिओर सेंट अन्ना, पीसा के प्रोफ़ेसर सिल्वेस्त्रो मिकेरा ने कहा, "यह पहली बार हुआ है जब किसी विकलांग को नकली हाथ में संवेदना का अहसास हुआ है."स बायोनिक हाथ में न केवल एडवांस वैज्ञानिक तकनीक का इस्तेमाल किया गया है बल्कि ऐसे इलेक्ट्रॉनिक्स और सॉफ्टवेयर लगाए गए हैं जो मस्तिष्क को संदेश भेजते हैं.
मिकेरा और उनकी टीम ने इस कृत्रिम हाथ में ऐसे संवेदक लगाए जो किसी चीज को छूने पर उसके बारे में सूचना देते हैं.
कम्प्यूटर एल्गोरिदम के इस्तेमाल से वैज्ञानिकों ने इलेक्ट्रिकल संकेतों को एक ऐसी उत्तेजना में बदला जिसे संवेदी तंत्रिकाएं समझ सकें.
रोम में ऑपरेशन के दौरान मरीज़ के बाजू के ऊपरी हिस्से की तंत्रिकाओं में चार इलेक्ट्रोड जोड़े गए. ये इलेक्ट्रोड कृत्रिम हाथ की उंगलियों के संवेदकों से जुड़े थे जो छूने और दवाब के फीडबैक को सीधे मस्तिष्क को भेजते हैं.

प्रयोगशाला

कृत्रिम हाथ
36 साल के आबो ने एक महीने प्रयोगशाला में बिताए. प्रयोगशाला में पहले तो इस बात की जाँच की गई कि इलेक्ट्रोड काम कर रहे हैं या नहीं. फिर यह देखा गया कि ये बायोनिक हाथ से पूरी तरह जुड़े हैं या नहीं.
उन्होंने कहा, "मज़ेदार बात यह है कि इसके सहारे मैं मुझे बिना देखे ही छूने से चीज़ों का अहसास हो जाता है. मैं अंधेरे में भी इसका इस्तेमाल कर सकता हूं."
यह बायोनिक हाथ अभी शुरुआती चरण में है और सुरक्षा कारणों से आबो का एक और ऑपरेशन करना पड़ा ताकि संवेदकों को हटाया जा सके.
बायोनिक हाथ को विकसित करने वाली टीम अब इस प्रयास में जुटी है कि इसे छोटा कैसे बनाया जाए ताकि इसे घर में इस्तेमाल किया जा सके.
वैज्ञानिकों का कहना है कि इस हाथ के व्यावसायिक इस्तेमाल में एक दशक तक का समय लग सकता है. उनका कहना है कि इससे भविष्य में कृत्रिम अंगों का रास्ता साफ़ होगा जो वस्तुओं और तापमान का पता बता सकेंगे.

बहरहाल आबो को उनका पुराना कृत्रिम हाथ मिल गया है और वह भविष्य में इसे बायोनिक हाथ से बदलने को तैयार हैं. sabhar :http://www.bbc.co.uk/   sabhar :http://www.palpalindia.com

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