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पुरातन ज्ञान के खण्डहरों पर खड़ा है आज का विज्ञान

प्राचीन काल ज्ञान विज्ञान की दृष्टि से कितना समृद्ध था, इसका अनुमान तब के सुविकसित यंत्र उपकरणों एवं वास्तुशास्त्र से संबंधित अद्भुत निर्माणों से लगाया जा सकता है। आज तो उनकी हम बस कल्पना ही कर सकते है। यथार्थतः ज्ञान और विज्ञान को समझने में तो शायद सदियों लगा जाएँ।
आर्ष उल्लेखों से ऐसा ज्ञात होता है कि प्राचीन समय के दो मूर्धन्य वैज्ञानिकों-वास्तु विदों में त्वष्टा एवं मय अग्रगण्य थे। त्वष्टा एवं मय अग्रगण्य थे। अर्थात् विश्वकर्मा देवों के विज्ञानवेत्ता थे। और तरह तरह के आश्चर्यचकित करने वाले शोध अनुसंधानों सदा संलग्न रहते थे,। जबकि मय, विश्वकर्मा के प्रतिद्वंद्वी और असुरों की सहायता में निरत रहते थे। उनके उपकरण देवों पर विजय प्राप्ति हे दानवों के लिए होते थे। या तो विश्वकर्मा को संपूर्ण सृष्टि का रचयिता माना गया है। (विश्वकर्मन नमस्तेऽस्तु विशत्मन् विश्वसंभव) महाभारत शान्ति पर्व 47/75 किन्तु वे चिरपुरातन विधा वास्तु शास्त्र के प्रथम उपदेष्टा एवं प्रवर्तक आचार्य के रूप में अधिक विख्यात है। राजा भोजकृत ‘ समराँगण सूत्रधार के तीसरे अध्याय प्रश्नध्याय में खगोल विज्ञान मनोविज्ञान एवं शिल्प शास्त्र से संबंधित उन 60 प्रश्नों का वर्ण है।, जिसे विश्वकर्मा के ज्येष्ठ पुत्र जय अथवा सन्निवेश ने अपने पिता से पूछा था। ऐसे कहा जाता है कि उनका साठ प्रश्नों में उपर्युक्त सभी विधाओं विशेषकर शिल्पशास्त्र के संपूर्ण रहस्यों का समावेश है, जिनके विस्तृत उत्तर देकर त्वष्टा ने उन विधाओं का हस्तांतरण अपने पुत्र को किया था। बाद में इन्हीं जय ने वास्तुविज्ञान का विश्वविद्यालय स्थापित कर विधा को सर्वसुलभ ऋग्वेद के दशम मण्डल के 71 वाँ और 72 मुक्त विश्वकर्मा मुक्त है। ये भी अद्भुत बात है कि इन मुक्तकों के द्रष्टा और स्तोत्र भी विश्वकर्मा ही है। ऐसा अन्य सूक्तों नहीं देखा में नहीं देखा गया। ऋग्वेद (1/75/1) में उन्हें अत्यन्त निपुण मेधा संपन्न, कुशल शिल्पी कहा गया है। जो थोड़े समय में दिव्य शस्त्रास्त्रों के निर्माण में पारंगत है। चित्रकला, वास्तुकला, भित्तिकला के भी वे ज्ञाता है। तथा इनके प्रवर्तक आचार्य भी। वे कितने बड़े एवं निष्णात विज्ञानवेत्ता थे इसकी एक हल्की झाँकी ऋग्वेद एक मंत्र में करायी गई है उसमें कहा गया है- बाशीमेको विभर्ति हस्त आयासीमंतदेवेष निध्रुवविः। भाष्यकारों के अनुसार यहाँ आयोमय वाशी कोई बहुद्देशीय और बहुकार्यक्षम कुल्हाड़ा जैसा उपकरण है, जो उनके हाथ में सदा मौजूद रहता है। इससे वे शत्रुसंहार एवं संपूर्ण अपरा विद्या के संपादन का उभयपक्षीय प्रयोजन साथ-साथ पूरा करते हैं संभवतः इस हस्त कौशल के कारण ही उन्हें सुपाणि जैसा संज्ञा दी गई है। विश्वकर्मा शिल्प शास्त्र मयमतम् यह तकनीकी ज्ञान और विज्ञान के दो अद्वितीय ग्रंथ है। एक में त्वष्टा के शिल्प विद्या का वर्णन है तो दूसरे में मयकूज आविष्कारों का उल्लेख। इन ग्रन्थों को पढ़कर यह जाना जा सकता है कि पदार्थ विज्ञान के यह आदि पुरोधा कितने सूक्ष्म और उच्चस्तरीय ज्ञानसम्पन्न थे। दोनों ने ऐसे ऐसे यंत्र-उपकरणों का निर्माण किया था, जिन्हें चमत्कार से कम नहीं कहा जा सकता। इन्हीं में एक पुष्पक विमान यह विमान बहुत अद्भूतं था। पुष्पों और लताओं से निर्मित इस विमान की यह विशेषता थी कि वह आवश्यकतानुसार फैल और सिकुड़ सकता था। समय आपने पर वह व्यक्ति के बैठने जितना छोटा हो जाता था और जरूरत पड़ने पर विस्तृत होकर पूरे नगर को अपने अंदर समेट सकता था। इसकी रचना ब्रह्म के निर्देश पर विश्वकर्मा ने कुबेर ने कुबेर के लिये की थी। कुबेर उस जमाने में बहुत बड़े धनिक और गन्धर्वों के राजा थे उनकी राजधानी अलकनन्दा के उद्गम स्थल के निकट अलकापुरी में थी। रावण की दृष्टि जब कुबेर के इस अनूठे आकाशचारी यंत्र पर पड़ी तो उसने आक्रमण कर उसको छीन लिया रावण के पतन के बाद विभीषण ने उसे भगवान राम को सौंप दिया। सम्पूर्ण सेना उसी विमान सवार होकर आकाश मार्ग से अयोध्या आई थी कुछ समय तक निजी प्रयोजनों के लिए उसका इस्तेमाल करने के उपरान्त भगवान ने कुबेर को लौटा दिया।
यों तो यह किसी कल्पनाशील लेखक की काल्पनिक उड़ान सी लगती है।, पर आर्ष वांग्मय में उसके अनेक अस्त्र-आयुधों का उल्लेख है। जिसे आज के विकसित विज्ञान के युग में भी यथार्थ के धरातल पर उतार पाने की बात से दूर उसे सिद्धान्त रूप में स्वीकार कर पाने में भी कठिनाई महसूस हो रही है। इसका यह मतलब नहीं कि तब के सारे उल्लेख कोरी कल्पना मात्र है। आज से पाँच सौ वर्षों पूर्व आज के वैमानिकी यंत्रों को कल्पना कदाचित किसी की होगी। यदि उस समय का कोई व्यक्ति संप्रति जीवित होता है तो यह दुनिया और उसकी वैज्ञानिक प्रगति उसके लिये बहुत बड़ा अजूबा प्रतीत होती है। इतने पर भी आँखों से दिखाई पड़ने वाले सच को नकारा तो नहीं जा सकता है। कुछ ऐसा ही असमंजस वर्तमान मनुष्यों के समक्ष पुराविज्ञान के संदर्भ में उपस्थित हुआ है। उससे न तो दिव्य पुराउपकरणों को ठीक ठीक स्वीकारते बन पड़ रहा है, न नकारते। स्थिति बड़ी दुविधापूर्ण है। फिर भी विज्ञान संबंधी वर्तमान अनुसंधान और विकास में इस बात के संकेत मिल रहे है कि अपरवित्या के उस उत्कर्ष काल में संभव ऐसे दिव्य उपकरण अस्तित्व में रहे हो। जो वर्तमान ज्ञान परिधि से परे है।
पिछले दिनों अमेरिका ने टाँम केट नामक एक ऐसा वायुयान बनाया है जिसे प्राचीन पुष्पक विमान का अर्वाचीन संस्करण कह सकते है। अर्थात् उसमें संकुचन और प्रसार जैसी दोनों ही क्षमताएँ है। वह दो सीटों वाले वायुयान जितना छोटा भी हो सकता है। और इतना बड़ भी पूरा शहर समा जायें और महीनों ऊपर उड़ता रहे। सौर ऊर्जा और परमाणु शक्ति चलित विमान अमेरिका बना चुका है। अन्तर्ग्रही शटल की बात अब पुरानी पड़ चुकी है। इन सारे निर्माणों से ऐसा प्रतीत होता है कि पुष्पक विमान और सौर ऊर्जा और वनस्पति चेतना से चलित कोई यान रहा होगा। वनस्पति ऊर्जा का मूल स्रोत और सौर ऊर्जा भी है। इसलिये लता पुष्पों से निर्मित उस विमान में आक्सीजन और वातानुकूलक जैसी आवश्यकताओं की पूर्ति वनस्पतियों से होती होगी। जबकि उड्डयन का मूल प्रयोजन सौर ऊर्जा से पूरा होता होगा। ऐसे ही एक अन्य विलक्षण यंत्र का आविष्कार विश्वकर्मा ने किया था। लता यंत्र नामक यह उपकरण शत्रुओं अथवा अपराधियों को जकड़ने के काम आता था। वामन पुराण में में एक मिथक है। कि विश्वकर्मा की पुत्री चित्रगन्धा और राजा सूरत एक दूसरे को चाहते थे और परस्पर विवाह करने के इच्छुक थे। लेकिन त्वष्टा ने इसकी अनुमति नहीं दी। तब चित्रागन्धा मुनि ऋतध्वज के पास पहुँची और पिता के क्रोध की चर्चा करते हुए समस्या के हल के लिये मनुहार किया। ऋग्ध्वज तपस्वी और वाक्-सिद्ध थे। उनने विश्वकर्मा को वानर (वनवासी) बनने के श्राप दिया। पुत्री अत्याचार का शायद या सामाजिक दण्ड था। कि उन्हें नगर त्याग कर जंगल की शरण लेनी पड़ी। विश्वकर्मा भी इस अन्याय का बदला लिये बिना न रह सके उनने उसके पुत्र जाबालि को लता यंत्र में जकड़ लिया बालक जाबालि जीवित वृक्षों की जटाओं में बंधा असहाय पड़ रहा है। चीख पुकार सुनकर ऋग्ध्वज उसकी सहायता करने को तत्पर हुए उस विद्या ने तनिक भी गति न होने के कारण उसकी कुछ भी मदद न कर सके। अन्ततः तत्कालीन चक्रवर्ती सम्राट इक्ष्वाकु के पास जाकर इसकी शिकायत की उन्होंने ने वृक्ष को काट डालने का आदेश दिया। फिर लताओं का शिकंजा कमजोर नहीं पड़ा। और बालक उससे बुरी तरह जकड़ा रहा। हार कर ऋग्ध्वज को समझौता करना पड़ा उसने अपने पुत्र बंधन मुक्ति के बदलें त्वष्टा के समक्ष शापमोचन का प्रस्ताव रखा। वे सहर्ष तैयार हो गये। इस प्रस्ताव दोनों अपनी समस्याओं से उबर सके। शोध कर्मी वैज्ञानिकों का कहना है कि त्वष्टा निःसन्देह वनस्पति शास्त्र के पारंगत रहे होंगे उन्होंने वनस्पति व्यवहार विज्ञान और वनस्पति चेतना शास्त्र संबंधी सूक्ष्म जानकारी होगी। वे यह भी जानते होंगे कि पौधों के सूख जाने पर उसकी चेतना को प्रदत्त जिम्मेदारी के निर्वहन के लिये कैसे सहमति किया जाये। इन्हीं सभी विशेषताओं का संयुक्त परिणाम लता यंत्र था। आज का विज्ञान इसे बकवास कहकर भले ही अपनी झुझलाहट निकाल ले पर इतने से सत्य बदल नहीं सकता। उक्त आख्यान में वर्णन आता है कि सृष्टि के आरंभ से पूर्व पृथ्वी जीवधारियों के निवास योग्य नहीं थीं। कही ऊँचे पहाड़ तो कही एक दम गहरी घाटियाँ। कही समुद्र तो कही विशाल विवर पृथ्वी सर्वत्र फैले पड़े थे इन्हें जीवन के अनुकूल बनाने के लिये ब्रह्म जी ने राजा पृथु को यह उत्तरदायित्व सौंपा वे आपने अपूर्व पराक्रम से उन्हें समतल बनाने लगे। इससे पृथ्वी को असहाय कष्ट पहुँच रहा था। इसके अतिरिक्त डर यह भी था कि इस प्रक्रिया द्वारा उसका सहज स्वाभाविक रूप कही बिगड़ न जाये व गौ का रूप धर कर ब्रह्मा जी के पास गुहार करने गयी। उसकी शिकायत थी कि सम्राट बर्बर ध्वंसात्मक तरीका अपना रहे है। शिकायत उचित समझ कर उन्होंने इस कार्य हेतु किसी ऐसे सुविज्ञ और विवेकवान आचार्य की सेवा लेनी चाही जो ऐसा करते समय जीवधारियों के सुख दुख सुविधा असुविधा, प्रकृति तथा पर्यावरण संतुलन एवं यहाँ तक की पृथ्वी को नैसर्गिक सुषमा को कोई हानि न पहुँचे। इन सब बातों को ध्यान में रख सके किंचित् उधेड़ बुन के उपरान्त उनका ध्यान त्वष्टा की ओर गया। वे त्रधशाचार्य (पदार्थ के ठोस तरह और गैस अवस्थाओं की तकनीक ज्ञाता) और शिल्प शास्त्र के आदि प्रवर्तक तो थे ही पृथ्वी को समुन्नत और सुविकसित बनाने में उनकी विशेषज्ञता काम आ सकती है। यह सोच कर ब्रह्मा ने उन्हें भी इन योजना में सम्मिलित कर लिया। पृथु का बल और विश्वकर्मा का कौशल जब एकाकार हेतु पृथ्वी पर सृष्टि संरचना संबंधी उपयुक्त वातावरण बना। पृथधोहन और शोषण के सिद्धान्त परी चल रहे थे। ध्वंस भी शामिल था। त्वष्टा ने अपेक्षा कृत नर्म और विवेक पूर्ण प्रणाली अपनायी उनने निर्माण कोषाधोहन पर बल दिया। उभयपक्षीय पद्धति थी। इसमें पृथ्वी और प्राकृतिक सुरक्षा का भी ध्यान रखा गया था और जीवन समृद्धि का भी इस लिये उनकी यह परम्परा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। जितनी पहले थी। और बाद में भी रहेगी। मानसार नामक ग्रन्थ के 43 वें अध्याय में ऐसे अनेक रथों का वर्णन है। जो वायुवेग से चल कर लक्ष्य तक पहुँचते थे। उनमें बैठा व्यक्ति बिना अधिक समय गवाँए गंतव्य तक पहुँच जाता था। इन सभी के निर्माता विश्वकर्मा थे। अर्जुन के नन्दी होशरथ की पुष्टि भी उनने की थी। व दूर दूर से सूचना संकेत भी ग्रहण करता और सहयोगी सेनापतियों के लिये मात्र पूर्ण सन्देश प्रेषित प्रसारित करता था। व सुविधा दूसरे रथों में नहीं थी। इसके अतिरिक्त अनेक नगरों और उसके सभा भवनों का निर्माण त्वष्टा ने किया था। इन्द्र की राजधानी अमरावती और उसके सुधर्मा सभा भवनों सम्पूर्ण द्वारिकापुरी एवं उसके श्रीकृष्ण सभा भवन धर्मराज युधिष्ठिर इन्द्रप्रस्थ नगरी एवं उसके सभागार की रचना विश्वकर्मा ने ही की थी। इसी सभा भवन में दुर्योधन ने जल को थल और थल को जल समझने की गलती की थी। और द्रौपदी के उपहास का पात्र बना। महाभारत युद्ध में पाँडवों ने जिन अस्त्र शस्त्रों का प्रयोग किया उसके सृजेता त्वष्टा थे। जबकि कौरवों के आयुधों का विकास असुर शिल्पी मय किया था। अक्षय पात्र और अक्षय तुणीर भी विश्वकर्मा के निर्माण थे। अक्षय पात्र सुस्वादु भोजन प्रदान करता था। उसमें भोजन की कभी कमी नहीं पड़ती थी। जबकि अक्षय तुणीर एक ऐसा तस्कर था। जिसमें बाण कभी समाप्त नहीं होते थे। पात्र के खाली होने से पूर्व भर जाने का विज्ञान क्या था। यह शोध का विषय है निश्चय ही इसके पीछे निर्माण आपूर्ति की कोई ऐसी उच्च स्तरीय टेक्नोलॉजी थी। जिसका आज हम सिर्फ अनुमान ही लगा सकते है। विष्णु का चक्र इन्द्र का वृज, शिव का त्रिशूल दुर्गा का भाला, इन सबके रचनात्मक त्वष्टा ही थे। त्रिकोण पर्वत पर स्थित कुबेर की लंका उन्हीं की कृति थी। बाद में जब उस पर असुर राज रावण ने अधिकार कर लिया तब असुर शिल्पी मय ने उसको अधिक भोगपूर्ण स्वर्ण लंका में परिवर्तित कर दिया।
यह त्वष्टा के निर्माण की चर्चा हुयी। प्राचीन काल के दूसरे विज्ञान के रता मय थे उनने भी एक से एक बढ़कर भवनों और आयुधों की सृष्टि की जिन दिनों यह दो मूर्धन्य विज्ञान विसारत अस्तित्व में थे उन दिनों देवों और दानवों में अक्सर युद्ध हुआ करता था। उससे सुरक्षा के लिये असुरों ने दानवों शिल्पी से कुछ विशिष्ट व्यवस्था का आग्रह किया। मय ने भगवान शंकर से सलाह कर तीन विशाल उपग्रहों का निर्माण किया यह आर्य भट्ट रोहिणी या इनसेट श्रेणी के उपग्रहों जितने छोटे नहीं थे इनका विस्तार मीलों में था और व्यवस्थित नगरों के रूप में बने थे। इन्हें त्रिपुर कहा जाता था। आकाश में ये पृथक् पृथक् रहते थे किन्तु आवश्यकता पड़ने परस्पर मिल भी जाते थे। इतना उच्च स्तरीय विज्ञान था। आज जिस प्रकार अंतरिक्ष यान आकाश में एक दूसरे से जुड़ जाते है और फिर अलग हो जाते है। वैसे ही ये मय कृत उपग्रह थे। ऐसा नियम था कि पुष्प नक्षत्र में ही इनका मिलन अंतरिक्ष में होता था। तब तीनों उपग्रहों की निवासी परस्पर विचारों का आदान प्रदान करते अथवा भावी रणनीति बनाते। जब तक यह पृथक् परिभ्रमण करते तब शत प्रतिशत अलग सुरक्षा की गारण्टी होती है। किन्तु मिलनकाल में विनाश का योग बलवती हो उठता था। कारण की उपग्रह द्वारा इसी मध्य खुलते थे। इनका परिक्रमा काल 26 दिनों का होता तब तक यह अंतरिक्ष में घूमते रहते या दूसरे ग्रह-नक्षत्रों की यात्रा करते यदा-कदा धरती पर उतर कर लूट मार करके सुरक्षित उड़ जाते 27 वे दिन कुछ नक्षत्र पर इनका मिलन होता उस दौरान लूट की संपत्ति का बटवारा होता। इस प्रकार जब दिनों दिन उनका अत्याचार बढ़ने लगा तो सभी परेशान हो उठे। अन्त में मयकृत इस संरचना को नष्ट करने की जिम्मेदारी विश्वकर्मा के कंधों पर डाली गयी उन्होंने ने एक ऐसे आकाशगामी रथ का निर्माण किया। जिससे मिसाइलों की तरह शक्तिशाली विध्वंसक बाण चलाये जा सकते हैं सृजन के पश्चात् भगवान शंकर को उस पर बिठाया और निवेदन किया उसे नक्षत्र के दौरान जब उपग्रहों के कपाट खुले तो तत्काल उन पर मिसाइलों-बाणों से हमला कर दें। लोककल्याण के निमित्त उन्होंने वैसा ही किया और मय के उन अद्भुत उपग्रहों को त्रिशूल से विनष्ट कर दिया, पर विज्ञान के उस निष्णात को मरने बचा लिया।
रूस और अमेरिका के छोटे-स्पेस स्टेशन अंतरिक्ष में आज भी प्रदक्षिणारत है। दोनों देशों के वैज्ञानिक उनमें समय समय पर जाकर प्रयोग परीक्षण सम्पन्न करते रहते है। पिछले दिनों दोनों स्टेशनों का परस्पर सफलतापूर्वक मिलन भी हुआ था, जिसके दौरान दोनों राष्ट्रों के वैज्ञानिकों ने अपने प्रयोगों द्वारा उपजा ज्ञान का आदान प्रदान किया इसी से आज गाया जा सकता है कि आज हम वैज्ञानिक विकास की दृष्टि से जहाँ पर खड़े है, उस ऊँचाई और उत्कर्ष को हमारे पूर्व पहले ही प्राप्त कर चुके थे।
मय यंत्र विद के साथ-साथ महान आर्कीटेक्ट भी थे। भवन निर्माण की उनकी रचना शैली का विशद वर्णन ‘मयशिल्पम्’ नामक ग्रंथ में मौजूद है वे मध्य अमेरिका के वर्तमान मैक्सिको देश के मूल निवासी थे। उत्खनन के दौरान प्राप्त मय सभ्यता के अवशेष वहाँ अब भी विद्यमान है।, जिन्हें देखकर विशेषज्ञ दाँतों तले उँगली दबा लेते है। उनकी समझ में यह नहीं आता कि इतनी उच्चस्तरीय तकनीक का प्रयोग तब के जमाने में किस प्रकार बन पड़ा? महर्षि वाल्मीकि ने मय के इसी ज्ञान, कला और कौशल से अभिभूत होकर रामायण के करीब पचास अध्यायों में उनके निर्माणों और शिल्पदक्षता का चित्ताकर्षक वर्ण किया है। तुलसीदास ने तो उससे और आगे बढ़कर शब्द अभाव की बात कहते हुए अपनी असमर्थता प्रकट कर दी। “ अरनि ने जाइ बनाव”
मैक्सिको स्थित मय की भूल नगर आर्ष साहित्य में भागवती पूरी के नाम से विख्यात है। इसकी रचना स्वयं मय ने की थी।। कथा सरित्सागर में भी भागवती पूरी के उत्कर्ष, समृद्धि और सुन्दरता का अद्भुत वर्णन है। ऐसा उल्लेख मिलता है कि वहाँ के बाद मय आर्यावर्त में हिमालय की तराई में आकर बस गए। वहाँ उनने अपनी पत्नी हेमा के नाम विलक्षण हेमपुर नगरी बनायी और बसायी। हेमा की एक अत्यंत अंतरंग सखी स्पयंप्रभा नामक अप्सरा थी। मय ने उसके लिए किष्किंधा के निकट ऋक्ष्बिल नामक एक तिलस्मी भवन बनाया था ऐसा वर्णन आता है। तमिलनाडु में अब भी वह ऋक्ष्बिल गुफा मौजूद है। कहते है कि सीता खोज के दौरान स्पयंप्री ने इसी कंदरा के भूमिगत शार्टकट मार्ग से हनुमान और उनके सहयोगियों को लंका के समुद्र तट तक पहुँचाया था।
जल, विद्युत प्रकाश, वायु परमाणु शक्ति जैसी ऊर्जाओं उपयोग मय-विद्या की प्रमुख विशेषता थी। उन्होंने ही सर्वप्रथम ऊर्जा के पदार्थ में रूपांतरण का अपना मय सिद्धान्त प्रस्तुत किया। वे सूर्य सिद्धान्त के प्रणेता माने जाते है।
अब से डेढ़ हजार वर्ष पूर्व मध्य अमेरिकी देश मैक्सिको में मय सभ्यता अपने पूर्ण उत्कर्ष पर थी। यह सभ्यता भी कहते हैं। यह मय सभ्यता की ही एक शाखा थी। इनके निर्माणों में सौ-सौ टन के ग्रेनाइट शिलाखंड प्रयुक्त हुए है, जो आश्चर्यजनक है। दो शिलाखण्डों के मध्य की संधियों में किसी सीमेन्ट जैसी चीज के प्रयोग के कोई प्रमाण नहीं है। यह उनकी परिष्कृत टेक्नोलॉजी की साक्षी है। पहाड़ की तलहटी में मार्गों की विशिष्ट बनावट, खाइयों के ऊपर पुलों के अवशेष, विमानों के उड़ने और उतरने की हवाई पट्टियों यह दर्शाती है कि मय की ज्ञान विज्ञान संबंधी जानकारी अति उच्चस्तरीय थी। यहाँ यह स्पष्ट कर देना अनुपयुक्त न होगा कि काल और संरचना की दृष्टि से भारतीय मय सभ्यता और मैक्सिको मय सभ्यता एकदम अभिन्न थी।, अतः इन्हें दो पृथक् सभ्यता न कहकर एक ही परंपरा का अंग मानना अनुचित न होगा।
आधुनिकतम विज्ञान पुरातन ज्ञान के खंडहर पर खड़ा है। भग्नावशेष से भवन की भव्यता का अनुमान लगाना कठिन नहीं है। यह भी अटकल आसानी से लगायी जा सकती है कि जिस विद्या का प्रशस्ति गान युग गा रहा है, वह कितनी मुश्किलों से प्राप्त की गई होगी और उसके लिए उपदेष्टाओं को कितना दीर्घकालीन तप करना पड़ा होगा तप की पूँजी ही उत्कर्ष का आधार है। आज भी उसके द्वारा हम ज्ञान-विज्ञान के उस शिखर पर पहुँच सकते, जहाँ कभी पूर्व में प्रतिष्ठित थे, यह सुनिश्चित है।
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