सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

पहनने वाली तकनीक से बदलेगी दुनिया?



गूगल ग्लास से पहले की दुनिया की ऐसी नहीं थी, जैसी अब हो गई है.
इस ग्लास के इस्तेमाल से आप फोटो ले सकते हैं, मैसेज भेज सकते हैं. इससे दिशा का पता चल सकता है और दूसरी तमाम चीजें भी कर सकते हैं.

क्लिक करें
ऐसे में वाकई में गूगल ग्लास अविश्वसनीय चीज है.
गूगल ग्लास उन पहनने वाली तकनीकों में शामिल है जिसके जरिए माना जा रहा है कि आम लोगों का जीवन बदल सकता है.
हालांकि इस मुद्दे पर अभी बहस जारी है कि कंप्यूटर और इंसानों के नजदीकी बढ़ने से किस तरह के सकारात्मक बदलाव होंगे, इन तकनीकों के बाज़ार और कारोबार के बारे में ज़्यादा चर्चा देखने को नहीं मिलती.

'तकनीक से हैप्पी बर्थडे'

"कल्पना कीजिए, एक शख्स बॉयलर को पकड़े हुए है, वह एक भारी उपकरण के नीचे है और उसे अपने हाथों के सहारे से उसे पकड़े रहना है, इसके बावजूद वह कंप्यूटिंग वातावरण में काम कर सकता है."
वेद सेन, प्रमुख, मोबिलिटी विभाग, कॉग्निजेंट टेक्नॉलॉजी सोल्यूशन
हालांकि अभी वियरेबल टेक्नॉलॉजी (ऐसी तकनीक जिसे पहनना संभव होगा) के शुरुआती दिन हैं लेकिन ढेरों ऐसी कंपनियां हैं जो इसके कारोबार पर ध्यान देने लगी हैं.
अमरीकी क्लाउड टेक्नॉलॉजी कंपनी रैकस्पेस में हुए अनुसंधान से ये पता चला है कि अभी उनके कर्मचारियों के पास इन उपकरणों से महज छह फीसदी का ही कारोबार मिल पाया है.
लेकिन कॉग्निजेंट टेक्नॉलॉजी सोल्यूशन के मोबिलिटी विभाग के मुखिया वेद सेन के मुताबिक स्थिति में बदलाव होने वाला है.
गूगल ग्लास के प्रयोगों के दायरे को देखते हुए वे कहते हैं, “कल्पना कीजिए, एक शख्स बॉयलर को पकड़े हुए है, वह एक भारी उपकरण के नीचे है और उसे अपने हाथों के सहारे से उसे पकड़े रहना है, इसके बावजूद वह कंप्यूटिंग वातावरण में काम कर सकता है.”

कनेक्टिविटी से बदल जाएगी दुनिया

वेद सेन आगे कहते हैं कि एक सेल्स पर्सन के उदाहरण को देखिए, जो अपने किसी उपभोक्ता के दफ्तर में पहुंचता है और वहां उसे सारी सूचनाएं अपनी आंखों के सामने चाहिए. मसलन, कंपनी से अंतिम ऑर्डर क्या दिया था?, क्या वे इससे ख़ुश थे? या फिर उपभोक्ता का अंतिम जन्मदिन कब था?
ऐसी स्मार्ट तकनीकों का प्रयोग केवल चश्मे के तौर पर नहीं होगा.
सेन कहते हैं, “मान लीजिए कि मैं एक बड़े सुविधा केंद्र का मैनेजर हूं. मैं टहल रहा हूं. मेरे जूते में कोई चीज है. मैं एक उपकरण को इस्तेमाल करता हूं जो बता देता है कि वो चीज इस्तेमाल के लायक है या नहीं, या फिर आवाज़ के जरिए मुझे सूचित कर देते हैं.”
दरअसल इन स्मार्ट तकनीकों के सहारे इंसानों के आसपास से संपर्क कहीं ज्यादा मज़बूत हो सकता है. वेद सेन कहते है, “इससे हमारे चीजों को समझने की क्षमता बेहतर होगी.”
डेलॉइट के रिसर्च निदेशक डंकन स्टीवार्ट ने कहा कि वियरेबल टेक्नॉलॉजी से कारोबार की दुनिया पर काफी असर पड़ेगा. ख़ासकर उन क्षेत्रों में जहां दूसरी चीजें का स्तर कमतर है.
वे कहते हैं, “स्मार्ट फोन और पर्सनल कंप्यूटर को बदलने पर असर नहीं होगा लेकिन जिन लोगों का संपर्क मोबाइल और लैपटॉप से नहीं है, उनके हाथों में इन तकनीकों के आने से काफी असर पड़ेगा.”
डंकन स्टीवार्ट कहते हैं, “कोई फोर्कलिफ्ट चला रहा हो तो वह पीसी और स्मार्टफोन का इस्तेमाल नहीं कर सकता, क्योंकि इससे टक्कर लगने का अंदेशा पैदा हो जाएगा. लेकिन कल्पना कीजिए वह फोर्कलिफ्ट को चलाते हुए ही कोई बॉक्स खोल ले और उससे अपने काम की चीज को बाहर निकाल ले.”

रिटेल कारोबार पर असर

उन्होंने तुलानात्मक तौर पर बताया है कि मोबाइल फोन के जरिए भुगतान से क्रांतिकारी बदलाव अफ़्रीका में देखने को मिल रहा है.
"स्मार्ट फोन और पर्सनल कंप्यूटर को बदलने पर असर नहीं होगा लेकिन जिन लोगों का संपर्क मोबाइल और लैपटॉप से नहीं है, उनके हाथों में इन तकनीकों के आने से काफी असर पड़ेगा."
डंकन स्टीवार्ट, रिसर्च निदेशक, डेलोइट
डंकन के मुताबिक लोगों के चेक और एटीएम तक पहुंच की सुविधा उपलब्ध नहीं लेकिन वे बड़े पैमाने पर ऑनलाइन भुगतान कर रहे हैं.
स्वास्थ्य सेवाओं में वियरेबल तकनीकों का इस्तेमाल शुरू हो गया है. नाइके का फ्यूलबैंड ऐसी तकनीक है जो लोगों के शारीरिक गतिविधियों को मापती है.
उन गोलियों की बात भी हो रही है जिसको निगलने से ना केवल वह दवा का काम करेगी बल्कि वह शरीर पर होने वाली प्रतिक्रियाओं की निगरानी भी करेगी. रिटेल एनवायरनमेंट एक दूसरा क्षेत्र है जिसमें लाभ होने की उम्मीद की जा रही है.
वियरबेल तकनीक ग्राहकों को वैसा मौका उपलब्ध कराएगी जिससे वो उत्पादों के बीच तुलना कर पाएंगे. ठीक उसी तरह से जिस तरह से ऑनलाइन विशेष ऑफ़रों की पड़ताल होती है, लेकिन उन्हें अपनी आंखों के सामने इन उत्पादों के बारे में जानने को मौका मिलेगा.
डिजिटल कॉमर्स फर्म के वेंदू के निदेशक जेम्स क्रोनिन ने कहा कि कनेक्टेविटी बढ़ने से कारोबारी फायदा बढ़ेगा.
क्रोनिन कहते हैं, “निजीकरण के इस दौर में इससे उपभोक्ताओं और व्यापारियों को काफी फायदा होगा, पिछले कुछ सालों में ऑनलाइन कारोबार का चलन बढ़ा है.”
काग्निजेंट के वेद सेन के मुताबिक उपभोक्ताओं के लिए ये काफी फायदे का सौदा होगा जब वे किसी स्टोर में टीवी खरीदने जाएंगे और उन्हें टीवी की कीमतें, वारंटी और दूसरी तुलनात्मक चीजों के बारे में जानकारी मिल रही हो.
हालांकि वियरेबल टेक्नॉलॉजी के उपभोक्ताओं को टारगेट करने वाली कंपनियों को थोड़ी सावधानी भी बरतनी होगी.

निजता का सवाल

टेक्नॉलॉजी कंसलटेंसी एमेज के टुंडे कॉकशॉट कहते हैं, “वियरेबल उत्पाद अपनी प्रकृति में काफी व्यक्तिगत होते हैं.”
वे चेतावनी भरे लहजे में कहते हैं, “वे मेरे बारे में सूचना और अनुभव एकत्रित करते हैं, जैसे शरीर, स्थान, वातावरण, गतिविधि, विजन और मेरी दिलचस्पी के बारे में. इस तरह की जानकारी और नितांत व्यक्तिगत अनुभव के दायरे को ब्रांड दखल नहीं दे सकती.”
वे कहते हैं, “उन्हें इस बात पर विचार करना होगा कि वे इस आंकड़े का इस्तेमाल किस तरह से करते हैं ताकि वे प्रासंगिक भी बना रहे और उपभोक्ताओं को सेवा भी दे पाए.”

हैकरों के निशाने पर

हालांकि नई तकनीक के चलते कई ऐसे मुद्दे हैं जिसके बारे में विचार करना होगा. हालांकि शुरुआती तौर पर ये महंगा भी होगा और इसमें मुश्किलें भी सामने आएंगी.
इसके अलावा दूसरी सामान्य मुश्किलें भी सामने आ सकती हैं- मसलन बैटरी का समाप्त हो जाना. इससे उन लोगों को काफी मुश्किल जो ऐसे उपकरणों पर निर्भर हो जाएंगे.
हालांकि इसमें प्राइवेसी और सुरक्षा का मसला जुड़ा है. अगर पहनने वाली तकनीकों के इस्तेमाल से ढेर सारी सूचनाएं प्राप्त हो सकेंगी तो फिर ये तकनीक हैकरों के निशाने पर होंगी.

हैकरों की कंपनी ट्रस्टवेव के सीनियर वाइस प्रेसीडेंट निकोलस पेरकोको ने कहा, “अगर मैं एक हमलावर हूं तो मैं किसी के व्यक्तिगत जीवन और उसके बारे में तमाम जानकारी हासिल करना चाहूंगी और इसके लिए मैं वियरेबल तकनीकों में सेंध लगाऊंगा.” sabhar : bbc.co.uk

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

vigyan ke naye samachar ke liye dekhe

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

समय क्या है ? समय का निर्माण कैसे होता है?

भौतिक वैज्ञानिक तथा लेखक पाल डेवीस के अनुसार “समय” आइंस्टाइन की अधूरी क्रांति है। समय की प्रकृति से जुड़े अनेक अनसुलझे प्रश्न है। समय क्या है ?समय का निर्माण कैसे होता है ?गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से समय धीमा कैसे हो जाता है ?गति मे समय धीमा क्यों हो जाता है ?क्या समय एक आयाम है ?अरस्तु ने अनुमान लगाया था कि समय गति का प्रभाव हो सकता है लेकिन उन्होने यह भी कहा था कि गति धीमी या तेज हो सकती है लेकिन समय नहीं! अरस्तु के पास आइंस्टाइन के सापेक्षतावाद के सिद्धांत को जानने का कोई माध्यम नही था जिसके अनुसार समय की गति मे परिवर्तन संभव है। इसी तरह जब आइंस्टाइन साधारण सापेक्षतावाद के सिद्धांत के विकास पर कार्य कर रहे थे और उन्होने क्रांतिकारी प्रस्ताव रखा था कि द्रव्यमान के प्रभाव से अंतराल मे वक्रता आती है। लेकिन उस समय आइंस्टाइन  नही जानते थे कि ब्रह्माण्ड का विस्तार हो रहा है। ब्रह्माण्ड के विस्तार करने की खोज एडवीन हब्बल ने आइंस्टाइन द्वारा “साधारण सापेक्षतावाद” के सिद्धांत के प्रकाशित करने के 13 वर्षो बाद की थी। यदि आइंस्टाइन को विस्तार करते ब्रह्माण्ड का ज्ञान होता तो वे इसे अपने साधारण …

30 सेकंड के फर्क ने मिटा दिया था डायनसोर युग का वजूद

डायनासोर युग के अंत के लिए कहा जाता है कि एक बहुत बड़ा ऐस्टरॉइड धरती से टकराया था जिससे पैदा हुए विस्फोट ने इन विशालकाय जानवरों का वजूद खत्म कर दिया। लेकिन इस विस्फोट की टाइमिंग को लेकर बीबीसी की एक डॉक्युमेंट्री में बहुत दिलचस्प तथ्य सामने आया है। द डे डायनासोर डाइड नाम की इस डॉक्युमेंट्री में बताया गया है कि जिस ऐस्टरॉइड ने डायनासोरों का अंत किया, अगर वह धरती से 30 सेकंड जल्दी (पहले) या 30 सेकंड देर (बाद) से टकराता तो उसका असर जमीनी भूभाग पर इतना कम होता कि डायनासोर खत्म नहीं होते। ऐसा इसलिए क्योंकि 30 सेकंड की देरी या जल्दी गिरने की स्थिति में वह जमीन की बजाय समुद्र में गिरता।

यह ऐस्टरॉइड 6.6 करोड़ साल पहले मेक्सिको के युकटॉन प्रायद्वीप से टकराया था जिससे वहां 111 मील चौड़ा और 20 मील गहरा गड्ढा बन गया था। वैज्ञानिकों ने इस गड्ढे की जांच की तो वहां की चट्टान में सल्फर कम्पाउन्ड पाया गया। ऐस्टरॉइट की टक्कर से यह चट्टान वाष्प में बदल गई थी जिसने हवा में धूल का बादल बना दिया था। इसके परिणामस्वरूप पूरी धरती नाटकीय रूप से ठंडी हो गई और पूरे एक दशक तक इसी स्थिति में रही। उन हालात में अधिकत…

2050 की दुनिया

आने वाली दुनिया कैसी होगी। सबकी अपनी कल्पनाएं और अंदाजे हैं। विज्ञान दुनिया को नए तरीके से देख रहा है। फिल्मी दुनिया की अपनी फंतासियां हैं। बात हो रही है 2050 की। आज की कल्पनाएं निश्चित तौर पर आने वाले वक्तके धरातल पर होंगी। संभव है दिमाग को कम्प्यूटर की फाइल के तौर पर सुरक्षित रखा जाए। यह भी मुमकिन है कि आदमी गायब होना सीख ले। 

यह है फ्यूचरोलॉजी
ऎसा नहीं है कि भविष्य दर्शन केवल फिल्मकारों की कल्पना तक सीमित है। वैज्ञानिक भी इसमें खासी रूचि ले रहे हैं। तथ्यों और पूर्वानुमानों के सामंजस्य को विज्ञान की कसौटी पर परख कर भविष्य की कल्पना एक नए विज्ञान की राह खोल रही है। यह विज्ञान है फ्यूचरोलॉजी यानी भविष्य विज्ञान। क्या भविष्य में चांद पर बस्ती बसेगी। क्या हमारा परिचय धरती से परे किसी दूसरी दुनिया के प्राणियों से होगा। क्या इंसान मौत पर विजय पाने में कामयाब हो जाएगा। नामुमकिन सी लगने वाली ऎसी कल्पनाओं का वैज्ञानिक अध्ययन भी फ्यूचरोलॉजी के तहत किया जा रहा है। जिस तरह से मौसम-विज्ञानी भविष्य में मौसम का, अर्थशास्त्री भविष्य की विकास दर और इतिहासकार अतीत की घटनाओं का तार्किक आकलन पेश करते हैं…