कुछ वैज्ञानिकों द्वारा कृत्रिम बुद्धि का विकास किया जा रहा है जबकि कुछ अन्य वैज्ञानिकों द्वारा इस कृत्रिम बुद्धि से सुरक्षा के उपाए भी खोजे जा रहे हैं।
इस साल कैम्ब्रिज में एक विशेष अनुसंधान केंद्र खुल जाएगा, जिसका मुख्य कार्य- कृत्रिम बुद्धि से उत्पन्न ख़तरों का मुकाबला करना होगा। अभी कुछ समय पहले अमरीका के रक्षा विभाग ने एक निर्देश जारी किया था जो स्वचालित और अर्द्ध-स्वचालित युद्ध प्रणालियों के प्रति मानव के व्यवहार को निर्धारित करता है।
अमरीकी सैन्य अधिकारियों की इस चिंता को समझना कोई मुश्किल काम नहीं है। बात दरअसल यह है कि अमरीका अपनी सेना के रोबोटिकरण के मामले में दुनिया के अन्य देशों से बहुत आगे निकल गया है।
उसके पास कई प्रकार के "ड्रोन" विमान हैं। इसके अलावा, उसके पास रोबोट-इंजीनियर, रोबोट-सैनिक (मशीनगनों और ग्रेनेड लांचरों से लैस छोटे क्रॉलर प्लेटफार्म) पहले से ही मौजूद हैं। और मीडिया में समय-समय पर ऐसी चिंताजनक ख़बरें भी आती रहती हैं कि "चालक रहित वाहन नियंत्रण से बाहर हो गया है ...।"
लेकिन ये उड़ने, चलने और गोलियाँ चलानेवाली सभी मशीनें रेडियो प्रोग्रामों के ज़रिए पूरी तरह से मनुष्य द्वारा नियंत्रित "खिलौने" हैं। बेशक, फ़ौजी लोग इस बात के सपने ज़रूर देखते होंगे कि किसी न किसी दिन ऐसे लड़ाके रोबटों का निर्माण कर लिया जाएगा जो रणक्षेत्र में स्वयं ही निर्णय कर सकेंगे। इस सिलसिले में रूस के एक सैन्य विशेषज्ञ विक्टर बरानेत्स ने कहा-
स्वचालित सेनानी( रोबट-सैनिक) सभी चरणों पर स्वयं निर्णय नहीं ले सकता है। ऐसे निर्णय केवल मनुष्य ही कर सकता है। कई लोगों की तो यह राय भी है कि रोबट कभी भी शत-प्रतिशत निर्णय सवयं नही ले सकेगा। रणक्षेत्र में बदलती परिस्थितियों में केवल मनुष्य ही तुरंत निर्णय ले सकता है।
शस्त्र, दावपेच और रणनीति लगातार बदलते रहते हैं। सॉफ्टवेयर के निर्माता युद्ध के समय तेज़ी से बदलते दावपेचों के अनुसार शाफ्टवेयर में तालमेल नहीं बैठा सकते हैं। लेकिन यह भी कहा जा रहा है कि कृत्रिम बुद्धि न केवल युद्ध के मैदान में हावी हो सकती है, बल्कि इंटरनेट को भी अपने अधीन कर सकती है और वित्तीय प्रवाह को नियंत्रित कर सकती है। आजकल ऐसी मशीनें बन गई हैं जो शेयर बाज़ारों में बड़े बड़े बुद्धिमान लोगों को भी मात दे सकती हैं। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सोचनेवाली मशीन न केवल सभी प्रणालियों पर नियंत्रण कर सकती है बल्कि अपने ही जैसी नई मशीनें भी बना सकती है। उदाहरण के लिए, रोबोट ही रोबोटों का निर्माण कर सकते हैं। पहले से ही इस दिशा में काफ़ी सफल प्रयोग चल रहे हैं।
लेकिन इस क्षेत्र में असली सफलता तब मिलेगी जब नैनो तकनीक का उपयोग शुरू किया जाएगा। पिछली सदी के 9-वें दशक में नैनो तकनीक के विचारक एरिक ड्रेक्सलर ने "भूरा चिपचिपा द्रव्य" (grey goo) शब्दों का इस्तेमाल किया था। उनका कहना था कि स्वचालित नैनोरोबट किसी भी पदार्थ से अपने जैसे ही कई नए नैनोरोबटों का निर्माण कर सकते हैं। वे इतनी तीव्र गति से ऐसा करेंगे कि दुनिया में सभी सामग्रियों का अंत हो जाएगा, ये सामग्रियां नैनोरोबटों द्वारा निगल ली जाएंगी। इस संबंध में एक रूसी लेखक अलेक्सेय तुर्चिन ने चेतावनी दी है कि फ़िलहाल तो यह एक कोरी कल्पना है लेकिन भविष्य में यह वास्तविकता का रूप भी धारण कर सकती है। अलेक्सेय तुर्चिन कहते हैं-
अब यह बात स्पष्ट रूप से समझ में आने लगी है कि नैनोरोबटों का निर्माण कैसे किया जा सकता है। अगर नैनो-तकनीक विकसित होगी तो नैनो-रोबटों का निर्माण भी किया जा सकेगा। इसका मतलब यह है कि एक साल के बाद कृत्रिम बुद्धि भी निर्मित हो जाएगी। और अपनी बारी में कृत्रिम बुद्धि नैनो-रोबटों का निर्माण कर सकेगी। वास्तव में , सब कुछ एक ही साथ होने लगेगा। मुझे लगता है कि ऐसा चक्र आज से 10 साल के बाद शुरू हो जाएगा। यह चक्र इस शताब्दी के चौथे और पाँचवें दहाकों में अपनी चरम सीमा पर होगा।
"भूरा चिपचिपा द्रव्य" (grey goo)- "कयामत के दिन की ऐसी काल्पनिक मशीनें" हैं जे हमारी पृथ्वी पर जीवन का अंत कर सकेंगी। पर क्या ये "काल्पनिक मशीनें" हैं? "शीत युद्ध" के दौरान पश्चिमी मीडिया में इस ख़बर की खूब चर्चा हुई थी कि सोवियत संघ के पास "पेरेमीटर" नामक एक मशीन है जो खुद ही बड़े पैमाने पर परमाणु हमले कर सकती है। और अगर उसने एक बार ऐसा हमला कर दिया तो उसे रोकने वाला कोई नहीं होगा। पश्चिम में इस मशीन को "मृत हाथ" का नाम दिया गया था। विशेषज्ञों द्वारा अभी तक इस सवाल पर बहस चल रही है कि क्या यह मशीन पूरी तरह से आज़ाद थी या कि अंतिम निर्णय मानव द्वारा ही लिया जाता था। ख़ैर, जो भी हो इस "मृत हाथ" ने पृथ्वी पर जीवन को नष्ट नहीं किया है, और इसके उलट, इसने शायद जीवन की रक्षा की है।
कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि मनुष्य किसी भी मशीन से कहीं अधिक ख़तरनाक है। आखिरकार, मनुष्य ही सबसे भयानक तकनीकी आपदाओं के लिए ज़िम्मेदार है। जापानी परमाणु बिजली संयंत्र "फुकुशिमा-1" का उदाहरण एकदम ताज़ा है। इस संबंघ में एक प्रोग्रामर-विशेषज्ञ सेर्गेय मस्कालियोव ने कहा है-
प्रौद्योगिकी और मानव के बीच टकराव बढ़ गया है। "फुकुशिमा-1" के सभी उपकरण इस बात का संकेत दे रहे थे कि इस बिजलीघर को बंद कर दिया जाए। लेकिन लोग अपने अधिकारियों को फोन करने लगे, और अधिकारी अपनी सीट पर मौजूद ही नहीं थे। किसी न किसी को तो फैसला लेना था। लेकिन फैसला नहीं लिया गया क्योंकि किसी भी परमाणु बिजली संयंत्र को बंद करने का काम बहुत महंगा पड़ता है। केवल कंप्यूटर, यानी कृत्रिम बुद्धि ही यह कह रही थी कि परमाणु बिजलीघर को बंद कर देना चाहिए, लेकिन मानव ने ऐसा नहीं किया।
सेर्गेय मस्कालियोव ने यह भी कहा -
इस क्षेत्र में जीत कंप्यूटर की ही होगी। वह तो शराब भी नहीं पीता, किसी अन्य नशीले पदार्थ का सेवन भी नहीं करता। वह परेशान नहीं होता , किसी से नाराज़ नहीं होता, वह आत्महत्या भी नहीं करता। वह क्रोधित नहीं होता और जानबूझकर कोई दुर्घटना नहीं करता, लोगों का अपहरण नहीं करता। कोई भी मशीन अपने आप ऐसा नहीं कर सकती है। मुझे आशा है कि वह भविष्य में भी ऐसा नहीं करेगी।
बेशक, अगर परमाणु हथियारों से संबंधित कंप्यूटर "पागल हो जाएगा" तो सभी के लिए एक भारी मुसीबत खड़ी हो जाएगी। लेकिन, सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि यदि रोबोट प्रणाली मनुष्य के नियंत्रण में नहीं रहेगी तो भी घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है क्योंकि इस प्रणाली के अंदर ही एक दूसरी प्रणाली निहित है जो रोबोट प्रणाली को "आत्म-विनाश" करने पर मज़बूर कर देगी है। sabhar : http://hindi.ruvr.ru/
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