शनिवार, 31 अगस्त 2013

रहस्यमयी एंटीमैटर पकड़ने का दावा

रहस्यमयी एंटीमैटर पकड़ने का दावा

तकनीकी कमाल दिखाते हुए वैज्ञानिकों ने 16 मिनटों तक एंटीमैटर (प्रतिपदार्थ) को रिकार्ड समय तक इकट्ठा किए रखा.
उनका दावा है कि इससे एंटीमैटर के रहस्यों पर से पर्दा हट सकता है. एंटीमैटर रहस्यमयी पदार्थ है जिसे डॉन ब्राउन के उपन्यास और फिल्म 'एंजल्स एंड डेमन्स' में सर्वविनाशक हथियार के तौर पर दिखाया गया है. एंटीमैटर को रखना आसान नहीं क्योंकि कण और प्रतिकण एक-दूसरे से हुई टक्कर से पैदा ऊर्जा में खत्म हो जाते हैं. वैज्ञानिकों के अनुसार 14 अरब साल पहले बिग बैंग के समय पदार्थ और एंटीमैटर बराबर मात्रा में उपलब्ध थे.
अगर यह संतुलन बना रहता तो ब्राह्मांड आज जिस रूप में है उस आकार में नहीं रहता. अनजाने कारणों से प्रकृति में पदार्थ के लिए अनुकूलता है और एंटीमैटर आज दुर्लभ हो गया है. भौतिक शास्त्र के लिए यह बड़ी पहेली है. वैज्ञानिकों का कहना है कि हाइड्रोजन के अणुओं के साथ कम ऊर्जा के परीक्षण इस रहस्य को सुलझाने में अहम कदम साबित हो सकते हैं.
जेनेवा में प्रयोग करने वाली यूरोपीय ऑर्गेनाइजेशन फॉर न्यूक्लियर रिसर्च के अल्फा टीम के प्रवक्ता जैफरी हैंग्स्ट ने कहा, 'हम एंटीहाइड्रोजन परमाणुओं को हजार सेकंडों तक पकड़ कर रख सकते हैं. उनके अध्ययन के लिए यह समय और उनकी कम मात्रा भी पर्याप्त है. वैज्ञानिकों के अनुसार आधे ग्राम एंटी मैटर की शक्ति 20 हिरोशिमा जैसे परमाणु बनों के बराबर होती है लेकिन इसे बनाने में अरबों वर्ष लग जाएंगे.' sabhar : http://www.samaylive.com

चश्मे से छुटकारा जल्द

चश्मे से छुटकारा जल्द

क्या आप भी उन लोगों में से एक हैं जो चश्मे का इस्तेमाल करने से आजिज आ चुके हैं?
यदि ऐसा है तो चिंता न करें. वैज्ञानिकों ने एक ऐसा क्रांतिकारी तरीका ईजाद किया है जो लाखों लोगों को चश्मा पहनने की मजबूरी से हमेशा के लिए छुटकारा दिला सकता है.

वैज्ञानिकों ने जो नई चिकित्सा पद्धति विकसित की है उसके तहत आंखों के अंदर एक तरह का छोटा-सा प्लास्टिक प्रतिरोपित कर चश्मे की जरूरत को खत्म किया जा सकता है. 'जेड कामरा' नाम की इस शैली के प्रायोगिक परीक्षणों में काफी अच्छे परिणाम मिले हैं.

डेली टेलीग्राफ के अनुसार इस शैली में लेजर की मदद से कॉर्निया (आंखों के बाहरी लेंस) में एक हल्का सा छेद कर काफी महीन परत डाल दी जाती है. इससे आंखों में प्रवेश करने वाली रोशनी की मात्रा को नियंत्रित करने में सहूलियत होगी और स्पष्ट और साफ देखा जा सकेगा. ब्रिटेन में इस तरह का इलाज शुरू हो चुका है.

वैज्ञानिकों के मुताबिक 70 साल से ज्यादा उम्र के लोग, जिनकी दूर या पास की नजर काफी कम है, उन्हें इस नए इलाज का ज्यादा फायदा नहीं मिल सकेगा क्योंकि उनके कैट्रैक्ट्स को बदले जाने की जरूरत होती है.

इस तकनीक में एक आंख के प्लास्टिक प्रतिरोपण पर 2,800 पाउंड्स खर्च आएगा लेकिन 90 प्रतिशत मरीजों को दोनों आंखों के इलाज की जरूरत होगी जिस पर 4,600 पाउंड खर्च आएगा.

हालांकि ब्रिटेन के प्रमुख नेत्र चिकित्सक डॉ. लैरी बेंजामिन ने चेतावनी भी दी है कि यह बहुत दिलचस्प इलाज साबित होगा लेकिन हर किसी के लिए उपयुक्त साबित नहीं होगा जैसे कि पायलट, जिनकी रात को देखने की नजर बहुत महत्व रखती है. ऐसे में उनके लिए इसकी अनुमति नहीं दी जा सकेगी. sabhar:http://www.samaylive.com

प्रयोगशाला में विकसित हुआ इंसानी दिमाग़

human_brain_miniature

वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में छोटे आकार का ‘मानव मस्तिष्क’ विकसित किया है.
मटर के बराबर का ये अंग ठीक उतना बड़ा है जितना नौ हफ़्ते के भ्रूण में पाया जाता है. लेकिन इसमें सोचने की क्षमता नहीं है.

वैज्ञानिकों ने कुछ असामान्य बीमारियों की जानकारी हासिल करने के लिए इस ‘मस्तिष्क’ की मदद ली है.समझा जाता है कि ये तंत्रिका से जुड़ी बीमारियों के इलाज में मददगार साबित होगा.
इस शोध के बारे में विज्ञान पत्रिका ‘नेचर’ में लेख छपा है.

कोशिकाएं

तंत्रिका विज्ञान से जुड़े वैज्ञानिकों ने नई खोज को चौंका देनेवाला और दिलचस्प बताया है.
मानव मस्तिष्क शरीर में पाए जाने वाले सभी अंगों में सबसे अधिक जटिल माना जाता है.
'ऑस्ट्रियन अकादमी ऑफ़ साइंसेस' के वैज्ञानिक अब मानव मस्तिष्क के शुरूआती आकार को विकसित करने में कामयाब हो गए हैं.
वैज्ञानिकों ने इस प्रयोग के लिए या तो मूल भ्रूणीय को‏‏‏शिकाओं या वयस्क चर्म कोशिकाओं को चुना. इनकी मदद से भ्रूण के उस हिस्से को तैयार किया गया जहां दिमाग़ और रीढ़ की हड्डी का हिस्सा विकसित होता है.
मानव मस्तिष्क की निर्माण प्रक्रिया
इन कोशिकाओं को 'जेल' की छोटी बूंदों में रखा गया और फिर इन्हें घूमने वाले बायोरिएक्टर में डाला गया ताकि उन्हें पोषण और ऑक्सीजन हासिल होती रहे.
ये कोशिकाएं विकसित होकर ख़ुद को दिमाग़ के अलग-अलग हिस्सों में बांटने में कामयाब रही हैं. इसमें दिमाग़ का बाहरी आवरण, आंख के पीछे का पर्दा और बहुत कुछ मामलों में हिप्पोकैम्पस जैसे हिस्से मौजूद पाए गए हैं.
हिप्पोकैम्पस वयस्कों में याददाश्त से संबंधित हैं. ये मस्तिष्क पिछले साल भर से जीवित हैं.
वैज्ञानिकों का मानना है कि मस्तिष्क के विकास से दवाओं के रिसर्च में भी मदद मिलेगी. अब इन दवाओं का परीक्षण चूहों और दूसरे जानवरों के बदले इन्हीं पर हो सकेगा.

इससे पहले शोधकर्ता मस्तिष्क की कोशिकाओं का विकास कर पाए थे लेकिन ये पहली बार है जब वो इंसानी दिमाग़ को विकसित करने के इतने क़रीब पहुंचे हैं.
जेमस गैलागर
बीबीसी स्वास्थ्य और विज्ञान संवाददाता
 sabhar: www.bbs.co.uk

'फेस मशीन' पढ़ लेगी चेहरे की ख़ुशी और ग़म

फेस मशीन
बीबीसी संवाददाता समांथा फेनविक ने चेहरा पढ़ने वाली मशीन के प्रयोग में हिस्सा लिया

आपका चेहरा आपके बारे में क्या कह रहा है?
किसी के लिए ये बताना शायद मुश्किल हो लेकिन एक नई तकनीक के बारे में दावा किया जा रहा है कि वो चेहरा देखकर पहचान लेगी कि आप ख़ुश हैं, उदास हैं या बोर हो रहे हैं.

लेकिन कंपनी इसके लिए पहले आपकी अनुमति लेती है. इसके बाद बायोमेट्रिक ट्रैकिंग के लिए विशेष वेबकैम से आपके चेहरे के भावों को रिकार्ड करती है.इससे ऑनलाइन विज्ञापन कंपनियों को पता चल सकेगा कि आप उनके क्लिक करेंविज्ञापन पेज को देखकर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं?
इस तकनीक का इस्तेमाल अभी बड़े बजट के विज्ञापनों को लांच करने से पहले लोगों के रुझान को जानने के लिए किया जाता है.

अनौपचारिक प्रयोग

बीबीसी ने इस तकनीक का विकास करने वाले रीयलआइज़ के साथ मिलकर अपने रेडियो-4 के श्रोताओं पर प्रोग्राम ‘यू एंड योर्स’ की रिलीज से पहले अनौपचारिक प्रयोग किए.
"यह कंप्यूटर प्रोग्राम देखने में सक्षम है कि लोगों की भौंहें, मुंह और आंखें कैसे गति करती है? वैश्विक स्तर पर छह भावनाएं होती हैं, जो सबके लिए समान होती है. इसके ऊपर भौगोलिक क्षेत्र और उम्र का कोई प्रभाव नहीं पड़ता. हमने कंप्यूटर्स को लोगों के चेहरे पर आने वाली भावनाओं को पढ़ने में सक्षम बनाने के लिए प्रशिक्षित किया है."
मिखेल जैट्मा, प्रबंध निदेशक रियलआइज
इस प्रयोग में रेडियो-4 के 150 श्रोताओं की भावनाओं का पता लगाया गया, जिसमें रेडियो प्रोग्राम की बेहतरीन धुनों को सुनने के दौरान हंसने और मुंह बनाने की उनकी छोटी-छोटी भावनाओं को दर्ज किया गया.
प्रोग्राम सुनने वालों को द आर्चर्स और सेलिंग बाय की लोकप्रिय धुनों के साथ-साथ गॉड सेव द क्वीन की धुन भी सुनाई गई ताकि पता लगे कि श्रोता कैसे उनकी तुलना करते हैं.

चेहरा पढ़ती मशीन

रियलआइज़ के प्रबंध निदेशक मिखाइल जैट्मा ने बीबीसी को बताया कि “यहक्लिक करेंकंप्यूटर प्रोग्राम देखने में सक्षम है कि लोगों की भौंहें, मुंह और आंखें कैसे गति करती है? वैश्विक स्तर पर छह भावनाएं होती हैं, जो सबके लिए समान होती है. इनके ऊपर भौगोलिक क्षेत्र और उम्र का कोई प्रभाव नहीं पड़ता.”
मिखाइल जैट्मा कहते हैं कि “हमने कंप्यूटरों को लोगों के चेहरे पर आने वाली भावनाओं को पढ़ने में सक्षम बनाने के लिए प्रशिक्षित किया है.
हम उम्मीद करते हैं कि यह तकनीक क्लिक करेंभविष्य में विज्ञापनों को उपयुक्त, कम खीझ और दबाव वाला बनाने में सहायक होगी.”
लोगों के चेहरे के भावों से प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक द आर्चर्स और सेलिंग बाय के लिए प्रारंभ में ख़ुशी की दर ज़्यादा थी, जब लोगों ने धुनों को पहचानना शुरु किया.

इस प्रयोग में ख़ुशी के अतिरिक्त उलझन, गुस्से, आश्चर्य और अरुचि की भावनाओं का भी मूल्यांकन किया गया.
समांथा फेनविक
बीबीसी संवाददाता
sabhar : www.bbb.co.uk

आनुवंशिक कोड में परिवर्तन जीवों की उम्र बढ़ाए

आनुवंशिक कोड में परिवर्तन जीवों की उम्र बढ़ाए

जापान के राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने बताया है कि जीवों के आनुवंशिक कोड में परिवर्तन करके उनकी उम्र बढ़ाई जा सकती है। जापानी वैज्ञानिकों ने राइबोसोम के अध्ययन पर अपना ध्यान केंद्रित किया है। राइबोसोम जीवित कोशिकाओं का एक ऐसा घटक है जो एमिनो एसिड से प्रोटीन का संश्लेषण करता है।

वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध किया है कि राइबोसोम का अस्थिर व्यवहार ही जीवों का बुढ़ापा बढ़ने का कारण बनता है। वैज्ञानिकों ने आनुवंशिक कोड में परिवर्तन करके इस अस्थिरता को दूर करने का एक रास्ता भी खोज लिया है। उन्होंने फफूंदीय ख़मीर के जीवन को दो दिन से बढ़ाकर तीन दिन तक करने के काम में सफलता पाई है। वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष भी निकाला है कि इसी तरह से मानव जीवन को लम्बा करने के लिए भी नए तरीके खोजे जा सकते हैं। sabhar :http://hindi.ruvr.ru
और पढ़ें: http://hindi.ruvr.ru/news/2013_08_30/viv-umr-barhae/

बुधवार, 28 अगस्त 2013

प्रयोगशालाएं, जहां मौत के डर से बे-खौफ करते हैं वैज्ञानिक खोज

दुनिया जहान से बेखबर कुछ खोजने और दुनिया को देने की सनक वैज्ञानिकों में सदियों से रही है। उसी का नतीजा है कि आज हम ये सारे सुख भोग रहे हैं और आराम की जिंदगी जीते हैं। लेकिन कुछ जुनूनी अपनी जिंदगी को दांव लगाकर लगे हुए हैं खोज में।
 
शोधकर्ता हर चरम परिस्थिति में काम करने के लिए तैयार रहते हैं। इसके लिए उन्होंने बनाई हैं कुछ प्रयोगशालाएं, जो आम जगहों से दूर ऐसे हालातों में हैं जहां चल रहा है निरंतर शोध।
 
कैसे खतरनाक हालातों में ये काम कर पाते होंगे। आईए जानते हैं कुछ ऐसी ही प्रयोगशालाओं के बारे में, जो असामान्य वातावरण वाले स्थानों पर बनी हैं और वहां क्या होता है काम। 
 प्रयोगशालाएं, जहां मौत के डर से बे-खौफ करते हैं वैज्ञानिक खोज
सबसे गहरे पानी में स्थित लैब
अमेरिका के फ्लोरिडा में नोआ एक्वारिस रीफ बेस एकमात्र ऑपरेशनल अंडरवाटर लैब है। पिछले दो दशकों में शोधकर्ता यहां इकोलॉजी और रीफ का अध्ययन कर रहे हैं। इसके अलावा तरिक्षयात्रियों को भारहीनता जैसे कुछ अनुभव दिलाने के लिए नासा भी इसका प्रयोग करता है।
...................................प्रयोगशालाएं, जहां मौत के डर से बे-खौफ करते हैं वैज्ञानिक खोज

सर्वाधिक तापमान पैदा करने वाली लैब 
अमेरिका के शहर न्यूयॉर्क में स्थित ब्रूकहैवन नेशनल लैबोरेट्री में 4 ट्रिलियन डिग्री सेल्सियस तापमान पैदा किया जा चुका है। फरवरी 2010 में लेटिविस्टिक 
हैवी आयन कोलाइडर (आरएचआईसी) की मदद से इंसान द्वारा पैदा किया गया यह सर्वाधिक तापमान सूर्य के केंद्र की तुलना में 2,50,000गुना अधिक था। इसके लिए सोने के आयनों को प्रकाश की गति से टकराया गया था। आरएचआईसी दुनिया की एक मात्र फैसिलिटी है, जहां प्रोटॉन के घूमने का परीक्षण करने के लिए पोलराइज्ड प्रोटॉन की टक्कर कराई जाती है। इसके अलावा सबसे अधिक एनर्जी वाले प्रोटॉन को भी यहीं देखा गया है।
 
प्रयोगशालाएं, जहां मौत के डर से बे-खौफ करते हैं वैज्ञानिक खोज
सबसे बड़ी पार्टिकजिक्स लैल फिब 
जिनेवा के पास यूरोपियन ऑर्गेनाइजेशन फॉर न्यूक्लियर रिसर्च (सर्न) स्विट्जरलैंड में 250 एकड़ और फ्रांस में 1,125 एकड़ जगह में बनी है। यह जगह हाल में लार्ज ह्रेडन कोलाइडर (एलएचसी) के महाप्रयोग के कारण चर्चा में रही है। एलएचसी को 150 मीटर की गहराई में एक सुरंग के अंदर लगाया गया है, जो कि 27 किमी तक फैली है। यहां 113 देशों के 10,000 से अधिक वैज्ञानिक और इंजीनियर काम कर रहे हैं। इसके साथ ही 2,400 लोगों का फुल-टाइम स्टाफ भी है। इसकी स्थापना 1994 में हुई थी और दुनिया की प्रमुख टेक्नोलॉजी जैसे वर्ल्ड वाइड वेब का कास यहीं से हुआ।
प्रयोगशालाएं, जहां मौत के डर से बे-खौफ करते हैं वैज्ञानिक खोज

सबसे ठंडी फिजिक्स लैब 
अंटार्कटिका की जमी हुई मोटी बर्फ की परत के नीचे आइसक्यूब न्यूट्रिनो ऑब्जरवेट्री स्थापित है। यह धरती की सबसे ठंडी फिजिक्स लैब और दुनिया की सबसे बड़ी न्यूट्रिनो ऑब्जरवेट्री है। यहां रोजाना शोध से करीब एक टेराबाइट डाटा जमा होता है, जिसमें से 100 गीगाबाइट डाटा विश्लेषण के लिए भेजा जाता है। 
 
प्रयोगशालाएं, जहां मौत के डर से बे-खौफ करते हैं वैज्ञानिक खोज

सबसे ऊंची जगह पर प्रयोगशाला 
पाल के सागरमाथा नेशनल पार्क में समुद्र तल से 16,568 फीट की ऊंचाई पर पिरामिड लैबोरेट्री बनी है। यह तीन मंजिला पिरामिड के आकार वाली लैब ग्लास, स्टील और एल्युमिनियम से बनी है। यहां जियोलॉजी, क्लाइमेट, एन्वायर्नमेंट्री और ह्यूमन फिजियोलॉजी के बारे में रिसर्च की जाती है। इसे तीन हिस्सों में बांटा गया है। दो तलों में कई लैब और वेयरहाउस हैं और तीसरे तल में डाटा प्रोसेसिंग और टेलीकम्युनिकेशन्स की व्यवस्था की गई  sabhar : bhaskar.com

कृत्रिम बुद्धि और मानवजाति का भविष्य

कृत्रिम बुद्धि और मानवजाति का भविष्य

कुछ वैज्ञानिकों द्वारा कृत्रिम बुद्धि का विकास किया जा रहा है जबकि कुछ अन्य वैज्ञानिकों द्वारा इस कृत्रिम बुद्धि

कुछ वैज्ञानिकों द्वारा कृत्रिम बुद्धि का विकास किया जा रहा है जबकि कुछ अन्य वैज्ञानिकों द्वारा इस कृत्रिम बुद्धि से सुरक्षा के उपाए भी खोजे जा रहे हैं।
इस साल कैम्ब्रिज में एक विशेष अनुसंधान केंद्र खुल जाएगा, जिसका मुख्य कार्य- कृत्रिम बुद्धि से उत्पन्न ख़तरों का मुकाबला करना होगा। अभी कुछ समय पहले अमरीका के रक्षा विभाग ने एक निर्देश जारी किया था जो स्वचालित और अर्द्ध-स्वचालित युद्ध प्रणालियों के प्रति मानव के व्यवहार को निर्धारित करता है।
अमरीकी सैन्य अधिकारियों की इस चिंता को समझना कोई मुश्किल काम नहीं है। बात दरअसल यह है कि अमरीका अपनी सेना के रोबोटिकरण के मामले में दुनिया के अन्य देशों से बहुत आगे निकल गया है।
उसके पास कई प्रकार के "ड्रोन" विमान हैं। इसके अलावा, उसके पास रोबोट-इंजीनियर, रोबोट-सैनिक (मशीनगनों और ग्रेनेड लांचरों से लैस छोटे क्रॉलर प्लेटफार्म) पहले से ही मौजूद हैं। और मीडिया में समय-समय पर ऐसी चिंताजनक ख़बरें भी आती रहती हैं कि "चालक रहित वाहन नियंत्रण से बाहर हो गया है ...।"
लेकिन ये उड़ने, चलने और गोलियाँ चलानेवाली सभी मशीनें रेडियो प्रोग्रामों के ज़रिए पूरी तरह से मनुष्य द्वारा नियंत्रित "खिलौने" हैं। बेशक, फ़ौजी लोग इस बात के सपने ज़रूर देखते होंगे कि किसी न किसी दिन ऐसे लड़ाके रोबटों का निर्माण कर लिया जाएगा जो रणक्षेत्र में स्वयं ही निर्णय कर सकेंगे। इस सिलसिले में रूस के एक सैन्य विशेषज्ञ विक्टर बरानेत्स ने कहा-
स्वचालित सेनानी( रोबट-सैनिक) सभी चरणों पर स्वयं निर्णय नहीं ले सकता है। ऐसे निर्णय केवल मनुष्य ही कर सकता है। कई लोगों की तो यह राय भी है कि रोबट कभी भी शत-प्रतिशत निर्णय सवयं नही ले सकेगा। रणक्षेत्र में बदलती परिस्थितियों में केवल मनुष्य ही तुरंत निर्णय ले सकता है।
शस्त्र, दावपेच और रणनीति लगातार बदलते रहते हैं। सॉफ्टवेयर के निर्माता युद्ध के समय तेज़ी से बदलते दावपेचों के अनुसार शाफ्टवेयर में तालमेल नहीं बैठा सकते हैं। लेकिन यह भी कहा जा रहा है कि कृत्रिम बुद्धि न केवल युद्ध के मैदान में हावी हो सकती है, बल्कि इंटरनेट को भी अपने अधीन कर सकती है और वित्तीय प्रवाह को नियंत्रित कर सकती है। आजकल ऐसी मशीनें बन गई हैं जो शेयर बाज़ारों में बड़े बड़े बुद्धिमान लोगों को भी मात दे सकती हैं। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सोचनेवाली मशीन न केवल सभी प्रणालियों पर नियंत्रण कर सकती है बल्कि अपने ही जैसी नई मशीनें भी बना सकती है। उदाहरण के लिए, रोबोट ही रोबोटों का निर्माण कर सकते हैं। पहले से ही इस दिशा में काफ़ी सफल प्रयोग चल रहे हैं।
लेकिन इस क्षेत्र में असली सफलता तब मिलेगी जब नैनो तकनीक का उपयोग शुरू किया जाएगा। पिछली सदी के 9-वें दशक में नैनो तकनीक के विचारक एरिक ड्रेक्सलर ने "भूरा चिपचिपा द्रव्य" (grey goo) शब्दों का इस्तेमाल किया था। उनका कहना था कि स्वचालित नैनोरोबट किसी भी पदार्थ से अपने जैसे ही कई नए नैनोरोबटों का निर्माण कर सकते हैं। वे इतनी तीव्र गति से ऐसा करेंगे कि दुनिया में सभी सामग्रियों का अंत हो जाएगा, ये सामग्रियां नैनोरोबटों द्वारा निगल ली जाएंगी। इस संबंध में एक रूसी लेखक अलेक्सेय तुर्चिन ने चेतावनी दी है कि फ़िलहाल तो यह एक कोरी कल्पना है लेकिन भविष्य में यह वास्तविकता का रूप भी धारण कर सकती है। अलेक्सेय तुर्चिन कहते हैं-
अब यह बात स्पष्ट रूप से समझ में आने लगी है कि नैनोरोबटों का निर्माण कैसे किया जा सकता है। अगर नैनो-तकनीक विकसित होगी तो नैनो-रोबटों का निर्माण भी किया जा सकेगा। इसका मतलब यह है कि एक साल के बाद कृत्रिम बुद्धि भी निर्मित हो जाएगी। और अपनी बारी में कृत्रिम बुद्धि नैनो-रोबटों का निर्माण कर सकेगी। वास्तव में , सब कुछ एक ही साथ होने लगेगा। मुझे लगता है कि ऐसा चक्र आज से 10 साल के बाद शुरू हो जाएगा। यह चक्र इस शताब्दी के चौथे और पाँचवें दहाकों में अपनी चरम सीमा पर होगा।
"भूरा चिपचिपा द्रव्य" (grey goo)- "कयामत के दिन की ऐसी काल्पनिक मशीनें" हैं जे हमारी पृथ्वी पर जीवन का अंत कर सकेंगी। पर क्या ये "काल्पनिक मशीनें" हैं? "शीत युद्ध" के दौरान पश्चिमी मीडिया में इस ख़बर की खूब चर्चा हुई थी कि सोवियत संघ के पास "पेरेमीटर" नामक एक मशीन है जो खुद ही बड़े पैमाने पर परमाणु हमले कर सकती है। और अगर उसने एक बार ऐसा हमला कर दिया तो उसे रोकने वाला कोई नहीं होगा। पश्चिम में इस मशीन को "मृत हाथ" का नाम दिया गया था। विशेषज्ञों द्वारा अभी तक इस सवाल पर बहस चल रही है कि क्या यह मशीन पूरी तरह से आज़ाद थी या कि अंतिम निर्णय मानव द्वारा ही लिया जाता था। ख़ैर, जो भी हो इस "मृत हाथ" ने पृथ्वी पर जीवन को नष्ट नहीं किया है, और इसके उलट, इसने शायद जीवन की रक्षा की है।
कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि मनुष्य किसी भी मशीन से कहीं अधिक ख़तरनाक है। आखिरकार, मनुष्य ही सबसे भयानक तकनीकी आपदाओं के लिए ज़िम्मेदार है। जापानी परमाणु बिजली संयंत्र "फुकुशिमा-1" का उदाहरण एकदम ताज़ा है। इस संबंघ में एक प्रोग्रामर-विशेषज्ञ सेर्गेय मस्कालियोव ने कहा है-
प्रौद्योगिकी और मानव के बीच टकराव बढ़ गया है। "फुकुशिमा-1" के सभी उपकरण इस बात का संकेत दे रहे थे कि इस बिजलीघर को बंद कर दिया जाए। लेकिन लोग अपने अधिकारियों को फोन करने लगे, और अधिकारी अपनी सीट पर मौजूद ही नहीं थे। किसी न किसी को तो फैसला लेना था। लेकिन फैसला नहीं लिया गया क्योंकि किसी भी परमाणु बिजली संयंत्र को बंद करने का काम बहुत महंगा पड़ता है। केवल कंप्यूटर, यानी कृत्रिम बुद्धि ही यह कह रही थी कि परमाणु बिजलीघर को बंद कर देना चाहिए, लेकिन मानव ने ऐसा नहीं किया।
सेर्गेय मस्कालियोव ने यह भी कहा -
इस क्षेत्र में जीत कंप्यूटर की ही होगी। वह तो शराब भी नहीं पीता, किसी अन्य नशीले पदार्थ का सेवन भी नहीं करता। वह परेशान नहीं होता , किसी से नाराज़ नहीं होता, वह आत्महत्या भी नहीं करता। वह क्रोधित नहीं होता और जानबूझकर कोई दुर्घटना नहीं करता, लोगों का अपहरण नहीं करता। कोई भी मशीन अपने आप ऐसा नहीं कर सकती है। मुझे आशा है कि वह भविष्य में भी ऐसा नहीं करेगी।
बेशक, अगर परमाणु हथियारों से संबंधित कंप्यूटर "पागल हो जाएगा" तो सभी के लिए एक भारी मुसीबत खड़ी हो जाएगी। लेकिन, सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि यदि रोबोट प्रणाली मनुष्य के नियंत्रण में नहीं रहेगी तो भी घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है क्योंकि इस प्रणाली के अंदर ही एक दूसरी प्रणाली निहित है जो रोबोट प्रणाली को "आत्म-विनाश" करने पर मज़बूर कर देगी है। sabhar : http://hindi.ruvr.ru/
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मंगल के “निवासी” मानवजाति के लिए ख़तरा


मंगल के “निवासी” मानवजाति के लिए ख़तरा

पृथ्वी के निवासियों द्वारा मंगल ग्रह पर भेजे गए या भविष्य में भेजे जानेवाले अनुसंधान वाहन बेशक हमें अमूल्य जानकारी प्रदान कर सकते हैं लेकिन अगर ये वाहन पृथ्वी पर वापस लौटेंगे तो वे अपने साथ बिन बुलाए मेहमानों को भी ला सकते हैं। बेशक, ये हरी चमड़ी वाले मनुष्य नहीं होंगे। वैज्ञानिकों का कहना है कि ये बेहद सूक्ष्म जीव हो सकते हैं जो पृथ्वी के निवासियों के लिए एक भयानक ख़तरा बन सकते हैं।

अमरीका द्वारा मंगल ग्रह पर भेजे गए रोवर “क्युरियोसिटी” पर लगे एक खोज-यंत्र ने अभी हाल ही में इस गृह पर मीथेन गैस की मौजूदगी का पता लगाया है। इस गैस की मौजूदगी का मतलब यह है कि मंगल गृह पर जीव और पौधे भी मौजूद हो सकते हैं। पौधों और जीवों की वजह से ही पृथ्वी पर मीथेन गैस पैदा होती है। अब सवाल पैदा होता है कि क्या मंगल ग्रह पर वास्तव में जीव-जंतु और पौधे मोजूद हैं? वैज्ञानिकों का अनुमान है कि मंगल ग्रह पर बुद्धिमान प्राणी तो शायद नहीं रहते हैं लेकिन वहाँ अति सूक्ष्म अविकसत जीवों की मौजूदगी से इनकार नहीं किया जा सकता है। इस संबंध में रूसी विज्ञान अकादमी के अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान के एक वरिष्ठ शोधकर्ता मक्सिम मक्रोऊसोव ने "रेडियो रूस" को बताया-
मंगल ग्रह पर अभी तक स्वयं सूक्ष्म जीव तो नहीं मिले हैं लेकिन मंगल के वातावरण में मीथेन गैस की मौजूदगी का पता चला है। इसका मतलब यह है कि वहाँ जीवन भी मौजूद है। अगर ऐसा नहीं है तो हम इस सवाल का जवाब भी नहीं दे सकते हैं कि यह गैस वहाँ कहाँ से आई। विज्ञान हमें बताता है कि वातावरण में मीथेन गैस की मौजूदगी तब ही संभव हो सकती है यदि इस स्थान पर जीवों की निरंतर गतिविधियां होती हों। मीथेन गैस वास्तव में बहुत जल्दी ही अन्य गैसों के साथ पुनर्संयोजित होकर गायब हो जाती है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसे "मेहमानों" को मिलने से बचने में ही हमारी भलाई है। इस प्रकार के बैक्टीरिया ने अंतरिक्ष स्टेशन 'मीर' को लगभग नष्ट ही कर दिया था। एक ही स्थान पर उनके जमावड़े के कारण अंतरिक्ष स्टेशन 'मीर' के कई उपकरणों ने काम करना बंद कर दिया था। इसी तरह की घटनाएं अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर भी घट चुकी हैं। ये बैक्टीरिया पृथ्वी से वहाँ पहुँचाए गए थे। अंतरिक्ष में इनका विकास बहुत तेज़गति से होता है। इस संबंध में मक्सिम मक्रोऊसोव ने कहा-
हमारी पृथ्वी पर हवाएं चलती रहती हैं, यानी हमारी पृथ्वी पर वेंटिलेशन होती रहती है। अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आई.एस.एस.) पर वेंटिलेशन नहीं होती है। वहाँ कोई गुरुत्वाकर्षण भी नहीं है, हर जगह पर हवा निश्चल होती है। ऐसे वातावरण में बैक्टीरिया का विकास बहुत तेज़गति से होता है। अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर जो अंतरिक्ष यान भेजे जाते हैं उनकी खूब सफ़ाई की जाती है लेकिन फिर भी कुछ न कुछ फफूंद उनके साथ चले ही जाते हैं और अंतरिक्ष में जाकर वे बड़ी तेज़ी से बढ़ते हैं। अगर आप इंटरनेट में जाकर अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर स्थापित पैनलों की तस्वीरें ध्यान से देखें तो आपको वहाँ भारी मात्रा में फफूंद दिखाई देंगे।
इस मामले में इन सूक्षम जीवों की संख्या का उतना महत्त्व नहीं है जितना उनके गुणों का महत्त्व है। नए माहौल में वे उत्परिवर्तित हो जाते हैं, बदल जाते हैं। आप इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं कि अगर ग़लती से किसी अन्य ग्रह से पृथ्वी पर ऐसे सूक्षम जीव पहुँच जाएं तो फिर क्या हो सकता है? लोगों को नए घातक विषाणुओँ सामना करना पड़ सकता है। इस सिलसिले में रूसी विज्ञान अकादमी के पर्यावरण और जैव-चिकित्सा संस्थान की सूक्ष्म जीव-विज्ञान तथा रोगाणुरोधी प्रयोगशाला की प्रमुख नताल्या नोविकोवा ने कहा-
अंतरिक्ष यान को दूसरे ग्रहों की और भेजने से पहले पूरी तरह सेस्टेरलाइज़ नहीं किया जा सकता है। पूरी कोशिशों के बावजूद कुछ न कुछ सूक्ष्म जीव इन यानों पर रह सकते हैं। और जब वे दूसरे ग्रह के वातावरण में रहकर वापस पृथ्वी पर लौटेंगे तो हम इन जीवों के गुणों में आए परिवर्तन का अग्रिम अनुमान नहीं लगा सकेंगे।
दूसरे ग्रह का वातावरण सूक्ष्म जीवों के गुणों में गंभीर परिवर्तन कर सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि आज इन परिवर्तनों को पहचान पाना एक असंभव काम है। और अगर मंगल ग्रह के निवासी (अति सूक्षम जीव) और पृथ्वी से मंगल पर जानेवाले सूक्षम जीव एक साथ पृथ्वी पर वापस लौटेंगे तो वे मानवजाति के लिए कई नई मुसीबतों का स्रोत बन जाएंगे।

यूरी गगारिन ने कहा था : 'उड़नतश्तरियाँ सचमुच होती हैं

यूरी गगारिन ने कहा था : 'उड़नतश्तरियाँ सचमुच होती हैं'
Photo: RIA Novosti

12  अप्रैल 1961 को सोवियत संघ के नागरिक, सोवियत वायुसेना में मेजर यूरी गगारिन ने मानव इतिहास में

12  अप्रैल 1961 को सोवियत संघ के नागरिक, सोवियत वायुसेना में मेजर यूरी गगारिन ने मानव इतिहास में पहली बार 'वस्तोक-1' नामक अन्तरिक्ष यान में सवार होकर पृथ्वी की निकटतम परिधि  पर अंतरिक्ष की यात्रा की थी।
आज ऐसा लगता है मानो हम यूरी गगारिन की उस पहली उड़ान के बारे में सब कुछ जानते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है। एक विषय ऐसा है, जिसकी औपचारिक सूचना साधनों ने अक्सर उपेक्षा की है। यह विषय है —  उड़नतश्तरियाँ। जबकि यूरी गगारिन ने अपने संस्मरणों में लिखा है — 'उड़नतश्तरियाँ  एक वास्तविकता हैं। अगर आप मुझे इज़ाजत देंगे तो मैं उनके बारे में और भी बहुत-कुछ बता सकता हूँ।'
यह वाक्य सचमुच आश्चर्यजनक है क्योंकि तब, आज से चालीस-पचास साल पहले, सोवियत संघ में उड़नतश्तरियों के बारे में अंतरिक्ष यात्रियों और पत्रकारों को कुछ भी कहने या बताने की छूट नहीं थी। लेकिन इसके बावजूद उड़नतश्तरियों के साथ विभिन्न अंतरिक्ष-यात्रियों की मुलाक़ातों के बारे में बहुत-सी सामग्री इकट्ठी हो गई है। इनमें से कुछ बातें अब हम आपको बताते हैं।
गेरमन तितोव गगारिन के बाद अंतरिक्ष में जाने वाले दूसरे व्यक्ति थे। उन्होंने बताया कि 1961 में अपनी अन्तरिक्ष उड़ान के दौरान उन्होंने 7 उड़नतश्तरियाँ देखी थीं, जो उनके अन्तरिक्ष-यान के आसपास 'नाच' रही थीं।
26  फ़रवरी 1962  के दिन  'मरकरी फ़्रेंडशिप-7'  नामक अंतरिक्ष यान में उड़ान भर रहे  अमरीकी अंतरिक्ष-यात्री जॉन ग्लेनी ने  सिगार की शक़्ल की तरह की कोई अपरिचित चीज़ अंतरिक्ष में देखकर उसकी तस्वीरें ली थीं। सिगारनुमा इस यान के क़रीब एक भारी प्रकाशपुँज चमक रहा था। यह तस्वीर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी है।
12  अक्तूबर 1964  को 'वस्ख़ोद' नामक अंतरिक्ष-यान में पहली बार एक साथ तीन अंतरिक्ष-यात्री सवार होकर अंतरिक्ष में गए थे। कमारव, फ़िआक्तीस्तव और येगोरव नाम के इन तीनों अंतरिक्ष-यात्रियों ने पृथ्वी पर बने उड़ान संचालन केन्द्र को यह सूचना दी कि उनके यान को भयानक तेज़ी से उड़ रहीं डिस्क की शक़्ल की चीज़ों ने घेर लिया है। 5 दिवसीय इस उड़ान को यह सूचना मिलने के तुरन्त बाद बीच में ही  स्थगित कर दिया गया।
1968   में अमरीकी अंतरिक्ष-यात्रियों बोरमन, लॉवेल और एंड्रे जब 'अपोलो-8'  नामक अंतरिक्ष-यान में सवार होकर अंतरिक्ष में पहुँचे तो उन्होंने डिस्क की तरह गोल कुछ चीज़ों को देखा, जो ग्यारह हज़ार किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ़्तार से उड़ रही थीं। इन उड़नतश्तरियों के वहाँ पहुँचते ही 'अपोलो-8'  के सभी यंत्र-उपकरणों ने काम करना बंद कर दिया  तथा अमरीकी नगर ह्यूस्टन में बने उड़ान-संचालन केन्द्र से 'अपोलो-8'  का सम्बन्ध  टूट गया। इसके बाद इन रहस्यमयी चीज़ों ने 'अपोलो' को तेज़ रोशनी में नहला दिया और अपोलो  ऐसे  झूलने लगा, मानो कोई उसे झूले में झुला रहा  हो। इसके बाद एक बड़ी भयानक आवाज़ गूँजनी शुरू हो गई। इस आवाज़ से तीनों अंतरिक्ष-यात्रियों के कान के पर्दे जैसे फटने लगे और उनके कानों में  भयानक दर्द होना शुरू हो गया। कुछ पलों तक यही स्थिति रही। लेकिन कुछ ही मिनट बाद  अचानक ये  उड़नतश्तरियाँ कहीं ग़ायब हो गईं और वह भयानक आवाज़ तथा तेज़ रोशनी भी बंद हो गई। लेकिन  कुछ ही देर बाद 'अपोलो-8'  के पास डिस्क की तरह की ही एक और उड़नतश्तरी उभर आई जो  पहले वाली उड़नतश्तरियों से बहुत ज़्यादा बड़ी थी। अमरीकी अंतरिक्ष-यात्रियों के सारे शरीर में भयानक दर्द होने लगा। परन्तु 11 मिनट बाद यह उड़नतश्तरी भी ग़ायब हो गई और सब-कुछ पहले जैसा ही सामान्य हो गया। ह्यूस्टन के साथ सम्पर्क-लाइन भी तुरन्त ही काम करने लगी।
21  अप्रैल 1969  के दिन 'अपोलो-11'  नामक अंतरिक्ष-यान चाँद पर उतरा। यान से बाहर आकर अंतरिक्ष-यात्रियों आर्मस्ट्राँग और ओल्डरिन ने अपने सिर के ऊपर दो  उड़नतश्तरियों को देखा। उन्हें कुछ दूरी पर कुछ और उड़नतश्तरियाँ चन्द्रमा की सतह पर खड़ी दिखाई दीं। नासा अंतरिक्ष संगठन के भूतपूर्व सहकर्मी ओट्टो बिन्देर ने बताया कि   रेडियो-प्रेमियों ने 'अपोलो-11'   से आने वाले इस तरह के संदेश को  रिकार्ड किया था, जिसमें अंतरिक्ष-यात्री  कह रहे थे  — "हे भगवान!  ...आपको शायद ही इस बात पर विश्वास होगा कि यहाँ कुछ दूसरे यान भी दिखाई दे रहे हैं... जो कुछ ही दूर खड़े हुए हैं... क्रेटर के उस दूर वाले किनारे पर। वे हमें देख रहे हैं !"
अप्रैल 1975   में पृथ्वी से 195  किलोमीटर की ऊँचाई पर वाहक-रॉकेट के दुर्घटनाग्रस्त होने से अन्तरिक्ष-यान 'सोयूज-18'  का यात्री-कैपसूल उससे अलग हो गया। यह यात्री-कैपसूल पैराशूट के सहारे लाज़रेव और मकारव नाम के अंतरिक्ष-यात्रियों के साथ साईबेरिया के अल्ताई नामक पहाड़ी इलाके में सुरक्षित उतर आया। रात को इन अंतरिक्ष-यात्रियों के शिविर पर अचानक बैंगनी रंग की तेज़ रोशनी फैल गई। बाद में अचानक वह रोशनी ग़ायब हो गई। फिर वर्ष 1996 में लाज़रेव ने   बताया कि उनका यह मानना है कि इस  बैंगनी रोशनी फेंकने वाली चीज़ की वज़ह से ही वे दोनों अंतरिक्ष-यात्री एकदम पूरी तरह से सुरक्षित पृथ्वी पर लौट आए थे।
1978   में जब अंतरिक्ष-यात्री पपोविच एक यात्री-विमान में सवार होकर वाशिंगटन से मास्को लौट रहे थे तो  धरती से 10  हज़ार मीटर की ऊँचाई पर अपने विमान से क़रीब 1500  मीटर की दूरी पर उन्होंने आकाश में एक तिकोनी चीज़ को देखा, जो किसी नौका के पाल या बादबान की तरह लग रही थी।
5  मई 1981  को 'सल्यूत-6'  नामक अंतरिक्ष स्टेशन के कमांडर कवालेनक ने स्टेशन की खिड़की के बाहर एक अपरिचित बड़ी-सी गोल चीज़ को देखा, जो बाद में दो  घेरों में विभाजित हो गई। ये घेरे एक  कॉरीडोर जैसी चीज़ से जुड़े हुए थे।
1985  में  'सल्यूत-7'  नामक अंतरिक्ष-स्टेशन की उड़ान के 155 वे दिन अंतरिक्ष-स्टेशन पर उपस्थित  छह अंतरिक्ष-यात्रियों — कीज़िम, अत्कोफ़, सलाव्योव, सवीत्सकया, वोल्क और जानिबेकव ने स्टेशन की खिड़की के बाहर खुले अंतरिक्ष में सात बड़े-बड़े जीव देखे।  इन जीवों की बहुत कम चर्चा करते हुए उन्होंने इन्हें  'अंतरिक्षीय देवदूत'  कहा है। इन जीवों  की शक़्लें एक-दूसरे से अलग-अलग थीं।  लेकिन ये सभी जीव  ख़ुशी से मुस्करा रहे थे। क़रीब दस मिनट तक अंतरिक्ष-स्टेशन के पास बने रहकर ये  'देवदूत' अचानक ग़ायब हो गए। वर्ष 2007 में टेलिस्कोप 'हेब्ब्ल' ने भी पृथ्वी की परिधि पर सात चमकती हुई चीज़ों को नोट किया और उनकी तस्वीरें लीं। इन तस्वीरों में इन चीज़ों का आकार पंखों वाले किसी जीव की तरह था। 
1990  में अंतरिक्ष-स्टेशन 'मीर' में कार्यरत अंतरिक्ष-यात्रियों स्त्रेलकोव और मनाकव ने अपनी खिड़की के बाहर कुछ सैकंड तक एक गोल घेरे को चमकते हुए देखा जो किसी जलते हुए लट्टू की तरह लग रहा था।
1991  में अंतरिक्ष-यात्री मूसा मनारव ने अंतरिक्ष-स्टेशन 'मीर'  के बाहर एक अजीब-सी चीज़ देखी।  शुरू में उन्होंने सोचा कि यह एंटेना है, लेकिन कुछ ही देर में  वह एंटेनानुमा चीज़ अंतरिक्ष स्टेशन से बड़ी तेज़ी से दूर होती चली गई।
औपचारिक तौर पर रूस और अमरीका के अंतरिक्ष संगठन या तो इस तरह की सूचनाओं पर कोई टिप्पणी नहीं करते, या फिर इन्हें पत्रकारों की कपोल-कल्पना बताते हैं। लेकिन   उड़नतश्तरियों को देखे जाने की जो सूचनाएँ लगातार मिलती रहती हैं, वे यह सोचने को  बाध्य करती हैं कि धुआँ बिना आग के तो पैदा नहीं होता।  sabhar : http://hindi.ruvr.ru/
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मंगलवार, 27 अगस्त 2013

आ के फिर ना जायेगी जवानी

स्रोत फोटो : गूगल 

आ के  फिर ना जायेगी जवानी  जवानी जो तीनो पड़ाव मे मे सबसे  लुभावनी है  | कब सरक जाती है पता नहीं चलता  मगर ईधर पश्चिम  देशो मे  कयी ऐसी चौकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है | जो आई जवानी के वापस न जाने की बात कही है, यानी की सदाबहार जवानी का दावा  इस संदर्भ मे पिछले दिनो हावर्ड विश्विद्यालय से आई रिपोर्ट अपने आप मे पहली रिपोर्ट कही जा सकती है | जो जवानी की चाभी कही जाने वाली टेलोमियर्स को राह पे आने मे सफल हुई है |

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स्रोत फोटो : गूगल 
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 स्रोत फोटो : गूगल 

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      साभार : हिंदुस्तान दैनिक