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"रिसर्च का तरीका अलग है"




अभिजीत बोरकर माक्स प्लांक इंस्टीट्यूट में एस्ट्रोफिजिक्स विभाग में शोध कर रहे हैं. शर्मीले और शांत दिखने वाले अभिजीत को जर्मनी आए अभी कुछ ही समय हुआ है. वह शोध पूरा कर भारत लौटना पसंद करेंगे.
अभिजीत कहते हैं कि अगर वह भारत में विज्ञान को किसी तरह बढ़ावा दे पाएं और हाईस्कूल के बच्चों में विज्ञान के प्रति रुचि पैदा कर पाएं तो उनहें बहुत अच्छा लगेगा. मंथन में इस बार उन्होंने ब्लैक होल और उल्कापिंडों पर रोशनी डाली. पेश हैं उनसे बातचीत के कुछ अंश.
डॉयचे वेलेः अभिजीत जर्मनी में आपने अपने शोध के लिए कहां कहां आवेदन किया?
अभिजीत बोरकरः जी मैंने सिर्फ माक्स प्लांक संस्थान के लिए ही अप्लाई किया था. मेरा चयन यहां सबसे पहले हो गया, तो जुलाई 2012 में मैं यहां पीएचडी के लिए जर्मनी आ गया.
यहां शोध करने के लिए आपने कैसे आवेदन किया?
पीएचडी के लिए आप दो तरह से अप्लाई कर सकते हैं, या तो सीधे प्रोफेसर से संपर्क कीजिए और उन्हें ईमेल या फोन के जरिए अपना प्रोजेक्ट बताइए, या फिर आप उनके कॉलेजों में आवेदन कर सकते हैं. फिर बाकायदा इंटरव्यू होने के बाद छात्रों को चुना जाता है. मेरे मामले में जर्मनी आने की इच्छा खास थी. इसके अलावा मैंने जब अप्लाई किया तब मेरा मास्टर्स पूरा नहीं हुआ था और यही एक ऐसा संस्थान था जहां मैं ऐसी हालात में भी अप्लाई कर सकता था.
अपने रिसर्च के बारे में कुछ बताइए.
मैं हमारी आकाशगंगा के बारे में शोध कर रहा हूं. हमारी गैलेक्सी के केंद्र में जो सुपर मैसिव ब्लैक होल है, उसका रेडियोएनालिसिस करना मेरा विषय है. इसमें मैं वैसे तो अकेले ही काम कर रहा हूं. कभी कभार किसी के साथ सहयोग भी हो जाता है, लेकिन मूल तौर पर मेरा काम अकेले का ही है.
कौन सा आकर्षण था जो आपको एस्ट्रोफिजिक्स की ओर ले आया?
दो कारण थे. एक तो कि खगोल विज्ञान वैसे तो बहुत पुराना विज्ञान है, लेकिन इसमें शोध काफी कम हुआ है. अंतरिक्ष के बहुत से राज खुलने अभी बाकी हैं. भौतिकी के बाकी क्षेत्रों में काफी शोध हुआ है, जबकि खगोल विज्ञान में नहीं. तो यहां संभावनाएं काफी हैं. इससे भी अहम यह है कि सादी तकनीक के जरिए आप काफी जानकारी जमा कर सकते हैं. तो यह आसान तो है, लेकिन जटिल भी.
खगोल विज्ञान के क्षेत्र में शोध के लिए भारत में तकनीकी सुविधाएं कैसी हैं?
मैंने जो शोध देखे हैं या जिस फील्ड में फिलहाल मैं काम कर रहा हूं, वहां तकनीकी तौर पर बहुत अंतर नहीं है. सभी काम अंतरराष्ट्रीय साझेदारी में ही चलता है. टेलीस्कोप और अन्य चीजें अंतरराष्ट्रीय स्तर के हैं. फर्क काम करने के तरीके में है. ब्यूरोक्रैटिक काम में फर्क दिखता है, लेकिन तकनीकी तौर पर दोनों देशों में कोई फर्क नहीं है, खासकर मेरे शोध क्षेत्र में. लेकिन यह है कि भारतीय छात्रों को प्रैक्टिकल का अनुभव कम है. इसका कारण सिर्फ इतना है कि मास्टर्स में छात्रों को उतने मौके नहीं मिलते. तो उन्हें ज्यादा प्रोजेक्ट्स की जानकारी नहीं होती और तकनीक की भी जानकारी कम होती है. बैचलर के छात्रों को प्रयोग के दौरान सभी सुविधाएं उपलब्ध होती हैं. वह किसी भी मशीन का इस्तेमाल कर सकते हैं जो हमारे यहां नहीं होता.
और क्या फर्क दिखाई देते हैं.
एक बड़ा फर्क यह है कि कई बार छात्र स्नातक के बाद शोध के लिए एक दो साल का गैप ले लेते हैं, तो उन्हें शोध का थोड़ा अनुभव भी हो जाता है. जो हमारे यहां नहीं हो पाता.
जर्मनी में आकर आपने सबसे पहले क्या नया सीखा?
मेरे लिए यहां का वर्क कल्चर अहम था. यहां पर लोग नौ बजे आते हैं और सिर्फ पांच ही बजे तक काम करते हैं. और जब काम करते हैं तो सिर्फ काम ही करते हैं, इसके अलावा कुछ नहीं. यह मुझे रोचक लगा. दूसरा कि यहां के छात्रों का तकनीकी ज्ञान बहुत ही अलग होता है. मैंने देखा है कि भारत में छात्र थ्योरी में बहुत अच्छे होते हैं, लेकिन यहां के तकनीकी तौर पर बेहतर होते हैं.
आप यहां सबसे ज्यादा क्या मिस करते हैं?
खाना मिस करता हूं. और दूसरा है मौसम. यहां सूरज दिखाई ही नहीं देता, तो बहुत परेशानी होती है.
इंटरव्यूः आभा मोंढे
संपादनः ईशा भाटिया

sabhar : DW.DE


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