सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

प्रयोगशाला में ब्लैक होल

ब्लैक होल से सारे वैज्ञानिक भयभीत रहते है क्योंकी इसे ब्रमांड का सबसे बड़ा हत्यारा कहते हैं इससे प्रकाश तक बाहर नहीं निकलता और यदि कोई प्रकाश किरण आसपास से गुजरे तो उसे भी यह अपने में जप्त कर लेता है अब प्रयोगशाला में एक ब्लैक होल का निर्माण किया गया है यह सिर्फ रोचक ही नहीं बल्की उपयोगी भी साबित हो सकता है इस साल की सुरूआत में पद्र्यु युनिवेर्सिटी के अवेजेनी नारिमनोव और किल्दिसेव ने ब्लैक होल का एक सैधांतिक डिजाईन प्रकाशित किया था परिकलपना यह थी की एक ऐसा यन्त्र बनाया जाय जो ब्रह्माण्ड ब्लैक होल के गुण को दरसाय इनका विचार था की एक ऐसा यंत्र बनाना संभव है जिसमे प्रकाश लगातार अन्दर की ओर मुड़ता जाय इस विचार पर काम करते हुए अब चीन के दो वैज्ञानिक ताई जून कुई और केयेंग चेन ने सचमुच में एक ऐसा उपकरण तैयार किया है यह उपकरण ६० क्रमिक रूप से छोटे छोटे छल्लों से बना है हर छल्ला एक सर्किट बोर्ड की तरह होता है जिसके गुड धर्म प्रतेक छल्ले में बदलता रहता है जब बाहर से आने वाली विदुत चुम्बकीय तरंगे इस उपकरण पर पहुचती है तो वे इसमें फस जाती हैं केन्दरीय भाग के ओर धकेले जाती हैं तथा सोख लिया जाता हैं और तरंग इससे बाहर नहीं निकल पाती प्रकाशीय तरंगों को कैद करने वाला यह उपकरण ऊर्जा उत्पादन में उपयोगी हो सकता है यह सूर्य ऊर्जा को कैद करके विधुत ऊर्जा में बदल सकता हैं

टिप्पणियाँ

  1. sach yadi is tarah ka upakarn ijad ho gaya hai jo surya urja ko vidhyut urja me badal de to isase jyada upayogi koi anya upakaran nahi ho sakata.janakari ke liye dhanyavad.

    उत्तर देंहटाएं
  2. मेरे ब्लॉग पर आने के लिए और टिपण्णी देने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया! मेरे अन्य ब्लोगों पर भी आपका स्वागत है!
    मुझे आपका ब्लॉग बहुत अच्छा लगा! बहुत बढ़िया लिखा है आपने ! बहुत ही महत्वपूर्ण और ज्ञानवर्धक जानकारी प्राप्त हुई आपके पोस्ट के दौरान! धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

vigyan ke naye samachar ke liye dekhe

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

समय क्या है ? समय का निर्माण कैसे होता है?

भौतिक वैज्ञानिक तथा लेखक पाल डेवीस के अनुसार “समय” आइंस्टाइन की अधूरी क्रांति है। समय की प्रकृति से जुड़े अनेक अनसुलझे प्रश्न है। समय क्या है ?समय का निर्माण कैसे होता है ?गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से समय धीमा कैसे हो जाता है ?गति मे समय धीमा क्यों हो जाता है ?क्या समय एक आयाम है ?अरस्तु ने अनुमान लगाया था कि समय गति का प्रभाव हो सकता है लेकिन उन्होने यह भी कहा था कि गति धीमी या तेज हो सकती है लेकिन समय नहीं! अरस्तु के पास आइंस्टाइन के सापेक्षतावाद के सिद्धांत को जानने का कोई माध्यम नही था जिसके अनुसार समय की गति मे परिवर्तन संभव है। इसी तरह जब आइंस्टाइन साधारण सापेक्षतावाद के सिद्धांत के विकास पर कार्य कर रहे थे और उन्होने क्रांतिकारी प्रस्ताव रखा था कि द्रव्यमान के प्रभाव से अंतराल मे वक्रता आती है। लेकिन उस समय आइंस्टाइन  नही जानते थे कि ब्रह्माण्ड का विस्तार हो रहा है। ब्रह्माण्ड के विस्तार करने की खोज एडवीन हब्बल ने आइंस्टाइन द्वारा “साधारण सापेक्षतावाद” के सिद्धांत के प्रकाशित करने के 13 वर्षो बाद की थी। यदि आइंस्टाइन को विस्तार करते ब्रह्माण्ड का ज्ञान होता तो वे इसे अपने साधारण …

30 सेकंड के फर्क ने मिटा दिया था डायनसोर युग का वजूद

डायनासोर युग के अंत के लिए कहा जाता है कि एक बहुत बड़ा ऐस्टरॉइड धरती से टकराया था जिससे पैदा हुए विस्फोट ने इन विशालकाय जानवरों का वजूद खत्म कर दिया। लेकिन इस विस्फोट की टाइमिंग को लेकर बीबीसी की एक डॉक्युमेंट्री में बहुत दिलचस्प तथ्य सामने आया है। द डे डायनासोर डाइड नाम की इस डॉक्युमेंट्री में बताया गया है कि जिस ऐस्टरॉइड ने डायनासोरों का अंत किया, अगर वह धरती से 30 सेकंड जल्दी (पहले) या 30 सेकंड देर (बाद) से टकराता तो उसका असर जमीनी भूभाग पर इतना कम होता कि डायनासोर खत्म नहीं होते। ऐसा इसलिए क्योंकि 30 सेकंड की देरी या जल्दी गिरने की स्थिति में वह जमीन की बजाय समुद्र में गिरता।

यह ऐस्टरॉइड 6.6 करोड़ साल पहले मेक्सिको के युकटॉन प्रायद्वीप से टकराया था जिससे वहां 111 मील चौड़ा और 20 मील गहरा गड्ढा बन गया था। वैज्ञानिकों ने इस गड्ढे की जांच की तो वहां की चट्टान में सल्फर कम्पाउन्ड पाया गया। ऐस्टरॉइट की टक्कर से यह चट्टान वाष्प में बदल गई थी जिसने हवा में धूल का बादल बना दिया था। इसके परिणामस्वरूप पूरी धरती नाटकीय रूप से ठंडी हो गई और पूरे एक दशक तक इसी स्थिति में रही। उन हालात में अधिकत…

2050 की दुनिया

आने वाली दुनिया कैसी होगी। सबकी अपनी कल्पनाएं और अंदाजे हैं। विज्ञान दुनिया को नए तरीके से देख रहा है। फिल्मी दुनिया की अपनी फंतासियां हैं। बात हो रही है 2050 की। आज की कल्पनाएं निश्चित तौर पर आने वाले वक्तके धरातल पर होंगी। संभव है दिमाग को कम्प्यूटर की फाइल के तौर पर सुरक्षित रखा जाए। यह भी मुमकिन है कि आदमी गायब होना सीख ले। 

यह है फ्यूचरोलॉजी
ऎसा नहीं है कि भविष्य दर्शन केवल फिल्मकारों की कल्पना तक सीमित है। वैज्ञानिक भी इसमें खासी रूचि ले रहे हैं। तथ्यों और पूर्वानुमानों के सामंजस्य को विज्ञान की कसौटी पर परख कर भविष्य की कल्पना एक नए विज्ञान की राह खोल रही है। यह विज्ञान है फ्यूचरोलॉजी यानी भविष्य विज्ञान। क्या भविष्य में चांद पर बस्ती बसेगी। क्या हमारा परिचय धरती से परे किसी दूसरी दुनिया के प्राणियों से होगा। क्या इंसान मौत पर विजय पाने में कामयाब हो जाएगा। नामुमकिन सी लगने वाली ऎसी कल्पनाओं का वैज्ञानिक अध्ययन भी फ्यूचरोलॉजी के तहत किया जा रहा है। जिस तरह से मौसम-विज्ञानी भविष्य में मौसम का, अर्थशास्त्री भविष्य की विकास दर और इतिहासकार अतीत की घटनाओं का तार्किक आकलन पेश करते हैं…